Tuesday, July 25th, 2017
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टूरिज्म का कैशलेस कल्चर

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कुछ वक्त पहले मेरा किसी काम से अमेरिका जाना हुआ। न्यूयार्क की सड़कों पर घूमते हुए मैने एक बात पर गौर किया कि वहां छोटे से लेकर बड़ा दुकानदार तक कार्ड से भुगतान को तवज्जो देता है। उस वक्त मेरे पास कैश कुछ कम था, शायद इसलिए वो बात आज भी मेरे जहन में है। कुछ वैसी ही स्थिति का अनुभव आज मैं अपने देश में कर रहा हूं, हालांकि हालात उतने बेहतर नहीं हैं। लेकिन इसकी वजह महज इतनी है कि जो काम अमेरिका जैसे मुल्कों ने काफी पहले ही शुरू कर दिया था, उसकी नींव भारत में अब रखी गई है। वैसे दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले अमेरिका में आज भी 60 प्रतिशत लेनदेन कैश यानी नकदी में होता है, मगर यदि आप एक पर्यटक की हैसीयत से अंकल सैम के घर जाते हैं तो आपको नकदी का भार वहन करने की जरूरत शायद न पड़े। अमेरिका ने टूरिज्म को कैशलेस बनाने के लिए हर संभव प्रयास किए हैं। अमेरिका ही नहीं, अधिकतर पश्चिमी देश इस मामले में बाकी मुल्कों से कहीं आगे हैं। भारत की बात करें तो यहां कैशलेस की अवधारणा को जितने अच्छे ढंग से मौजूदा मोदी सरकार ने समझा है, यदि पूर्व की सरकारें इस बारे में सोच विचार करतीं तो शायद आज हम काफी बेहतर स्थिति में होते। खैर देर आए, दुरुस्त आए वाली कहावत, हर पहल पर सटीक बैठती है। राजनीतिक चश्मा हटाकर यदि आम भारतीय के नजरिए से मैं देखूं तो मुझे कैशलेस टूरिज्म में आपार संभावनाएं नजर आती हैं। भले ही हमें अभी कुछ कठनाइयों का अनुभव करना पड़ रहा हो, लेकिन आने वाले वक्त में यही कठनाई पर्यटक और पर्यटन व्यवसाय से जुड़े लोगों के जीवन को सरल बनाएगी। नोटबंदी यानी 8 नवंबर के बाद जितने भी पर्यटन क्षेत्रों में मेरा जाना हुआ, वहां इस बदलाव को अपनाने की होड़ साफ नजर आई, जो अपने आप में अच्छे संकेत हैं। अगर हम दो तीन महीने पहले की बात करें तो क्या यह संभव था कि सैंकड़ों मील दूर से आगरा आया पर्यटक, जिसका कैश खत्म हो चुका हो ताजमहल का दीदार कर पाता? लेकिन आज यह मुमकिन है। ताज के पश्चिमी और पूर्वी गेट पर कार्ड स्वाइप मशीनें लगाई गई हैं और लोग धड़ल्ले से उनका उपयोग कर रहे हैं। बीते कुछ दिनों में ही ताजमहल के आसपास से 7 8 हजार पीओएस मशीनों की मांग की गई है। पर्यटन का सबसे लोकप्रिय स्थल कहा जाने वाला गोवा भी कैशलेस कल्चर की राह पर बढ़ रहा है। पर्यटन विभाग ने अपने होटलों को तो नकदी मुक्त कर दिया है, अब पैकेज हॉलीडे और क्रूज की यात्राओं को भी कैशलेस बनाया जा रहा है। इत्तेफाक से बीते दिनों मेरी एक सज्जन से मुलाकात हुई, जो मौजूदा व्यवस्था के बीच कुछ दिन गोवा में गुजारकर आए थे। वो इस बात से खुश थे कि इस बार न तो उन्हें ज्यादा नकदी साथ लेकर जानी पड़ी और न ही एटीएम के चक्कर लगाने पड़े। टैक्सी और छोटे मोटे खर्चों को छोड़कर उन्होंने हर भुगतान कार्ड से किया। इससे पता चलता है कि शुरुआती दौर में ही कैशलेस टूरिज्म लोगों की सिरदर्दी कम करने लगा है। कल्पना कीजिए आने वाले कुछ सालों में जब जेब में रखा कार्ड हर तरह के भुगतान में सक्षम हो जाएगा, तो जिंदगी कितनी आसान हो जाएगी, खासकर एक पर्यटक के तौर पर। कैशलेस कल्चर की खिलाफत करने का वालों का तर्क है कि इससे पर्यटन व्यवसाय से जुड़े लोगों के साथ साथ संपूर्ण व्यापारी वर्ग को नुकसान है। लेकिन हकीकत में ऐसा कहीं नजर नहीं आता। चंद लोगों को छोड़ दिया जाए तो इस कवायद से सबका काम सरल ही होगा। ये चंद लोग वही हैं कि जो अब तक आय कम दिखाकर टैक्स कम भरते रहे हैं। इसलिए इनकी चिंता जायज है और सरकार का उस पर ध्यान न देना भी जायज। इस बारे में गोवा स्थित पाम्स होटल के संचालक से जब मेरी बात हुई तो जानकर अच्छा लगा कि लोग महज मजबूरी में नई व्यवस्था का हिस्सा नहीं बन रहे, बल्कि वो इसे अपनाकर खुश हैं। उनका कहना था कि कैशलेस सिस्टम उनकी परेशानियों को भी लैस कर देगा, क्योंकि अब इस बात की आशंका नहीं रहेगी कि भुगतान संबंधी कोई प्रविष्टि गलती से छूट गई या छोड़ दी गई। उनके मुताबिक, ऑफ सीजन में कई होटल कर्मचारी छूट का लालच देकर पर्यटकों को बिल उपलब्ध नहीं कराते और वो पूरी रकम उनकी जेब में चली जाती है। चूंकि इस लेनदेन का कोई रिकॉर्ड नहीं होता, तो कार्रवाई भी नहीं हो पाती। लेकिन कैशलेस से इस पर लगाम लगाने में मदद मिलेगी। नोटबंदी के बाद से हमारे यहां जितनी भी बुकिंग हुईं हैं, उनमें से लगभग 90 फीसदी का भुगतान डिजिटल माध्यम से ही किया गया। बात अकेले पाम्स होटल की नहीं है, अधिकतर लोग कैशलेस पहल के समर्थन में हैं। हालांकि अभी इस दिशा में काफी कुछ किया जाना है, ताकि जिस हकीकत की झलक दिखलाई गई है, वो मूर्तरूप ले सके। और मेरा मानना है कि यदि सरकारी मशनरी सही ढंग से इसे अमल में लाती है तो हालात बहुत जल्द सामान्य और सुगम हो जाएंगे। वैसे इस व्यवस्था की सफलता में स्थानीय प्रशासन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होगी। क्योंकि वही यह तय होगा कि पर्यटक को कैशलेस सुविधाएं मिलती हैं या नहीं। इसके लिए स्थानीय प्रशासन को स्वघोषित नियम कायदों वाले विक्रेताओं पर शिकंजा कसना होगा। पर्यटन स्थलों पर कई व्यापारियों ने डिजिटल पेमेंट के नियम खुद तय कर रखे हैं। मसलन, यदि आप 2000 रुपए से ज्यादा की खरीददारी करेंगे तो ही कार्ड मान्य है। अगर यह बरकरार रहता है, तो कैशलेस होना सुकून नहीं देगा। कुल मिलाकर कहा जाए तो कैशलेस प्रणाली भारत में टूरिज्म को एक नई ऊंचाई पर ले जाएगी, बर्श्ते इसका हाल अन्य सरकारी योजनाओं जैसा न हो।

कैशलेस टूरिज्मः कैसी हो यात्रा की तैयारी?
अगर आप कहीं बाहर घूमने का मन बना रहे हैं तो बेहतर होगा कि मौजूदा व्यवस्था के हिसाब से तैयारियों को अंजाम दें। क्योंकि कैशलेस बनने की दिशा में सरकार ने जो ऐतिहासिक फैसले लिए हैं उससे पर्यटन क्षेत्र भी अछूता नहीं है। महज थोड़े से दिनों में ही देश के अधिकांश पर्यटन क्षेत्र कैशलेस सिस्टम से जुड़ने की राह पर चल निकले हैं। 9 नवंबर के बाद से देश में कैश की किल्लत है। हालांकि हालात काफी हद तक सुधर गए हैं, लेकिन गाड़ी को पटरी पर लौटने में थोड़ा वक्त और लगेगा। इसलिए बैग पैक करते वक्त यह सुनिश्चित जरूर कर लें कि क्या आप कैशलेस टूरिज्म को अपनाने के लिए तैयार हैं? हाल ही में मेरी एक सज्जन से मुलाकात हुई, जो गोवा में कुछ दिन बिताकर लौटे हैं। उनके अनुभव से यह समझ आया कि कैश के किसी एक विकल्प के सहारे कहीं जाना आपकी खुशियों में खलल की वजह बन सकता है। गोवा की ही बात करें तो वहां नोटबंदी से पहले तक पर्यटन उद्योग को होने वाली कमाई में एक बड़ा हिस्सा नकद रूप में आता था। अब हालात बदल गए हैं, जो लोग पहले से ही कैशलेस सुविधाएं दे रहे थे उनके लिए तो सबकुछ पहले जैसा है मगर नकद स्वीकारने वालों को कुछ परेशानी हुई है। इस परेशानी से निकलने के लिए वो विकल्प तलाश रहे हैं और बतौर पर्यटक हमें उन विकल्पों की समझ होना जरूरी है। मसलन, समुद्र तट पर जितने भी शैक ;एक तरह के रेस्त्रां हैं, वहां डेबिट या क्रेडिट कार्ड नहीं चलता। क्योंकि उनके पास पीओएस मशीन नहीं हैं, जिनसे कार्ड स्वाइप होता है। इसलिए वो डिजिटल वॉलेट जैसे कि पेटीएम या मोबीक्विक का इस्तेमाल कर रहे हैं। गोवा में टूर एंड ट्रैवल्स व्यवसाय से जुड़े बॉबी कहते हैं, पर्यटकों को नकदी के जितने भी विकल्प हैं सभी से लैस होकर आना चाहिए। किसी एक पर निर्भर रहने का मतलब है, परेशानी को न्यौता देना। कई बार ऐसा होता है कि डिजिटल वॉलेट इंटरनेट की स्पीड कम होने के चलते काम नहीं करते, ऐसी स्थिति में बहुत मुश्किल हो जाती है। बॉबी और पर्यटन उद्योग से जुड़े उनके जैसे कई अन्य लोग पर्यटकों
को ऑनलाइन बैंक टू बैंक मनी ट्रांसफर का विकल्प भी मुहैया करा रहे हैं। कुल मिलाकर कहा जाए तो कैशलेस टूरिज्म के माहौल में अगर आपको अपनी छुट्टियों का भरपूर आनंद उठाना हैं, तो तैयारी पक्की होनी चाहिए।

क्या करना चहिए
डेबिट या क्रेडिट कार्ड साथ लेकर जाएं। यदि आपके पास दो अलग अलग बैंकों के कार्ड हैं, तो दोनों रखें। कभी कभी कोई कार्ड रीड नहीं करता, ऐसी स्थिति में अगर आपके पास दूसरी बैंक का कार्ड होगा तो बेहतर रहेगा। पेटीएम जैसे डिजिटल वॉलेट में कुछ पैसा जरूर रखें। हालांकि एक बार में बड़ी रकम अपने खाते से इस वॉलेट में ट्रांसफर करने से बचें। इसके अलावा यदि आपके पास इंटरनेट मोबाइल बैंकिंग की सुविधा नहीं है, तो उसे एक्टिव कराएं। क्योंकि अगर कार्ड या वॉलेट काम नहीं आता, तो इंटरनेट बैंकिंग आपका साथ दे सकती है।

लेखक
अभिषेक मेहरोत्रा

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