Monday, August 21st, 2017
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पेशाब के लिए इस व्यक्ति ने लड़ी रेल्वे से जंग, अब मिलेंगे 30 हजार रूपए




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भारतीय रेल में सफर तो आप सभी ने किया ही होगा। छुक-छुक करती रेलगाड़ी में अगर आपको सीट मिल जाए तो समझों आपने ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीत लिया हो। अगर आप पैसे वाले हैं तो टिकट कन्फर्म करने का झंझट होता हैं और अगर पैसे वाले नहीं है तो आपको ट्रेन के गेट के अंदर घुसने से ही झंझट का सामना करना पड़ता है।

भारतीय रेल नेटवर्क दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्क में शुमार है और इसमें हर दिन करोड़ो लोग ट्रेवल करते हैं। काफी कम किराए पर ट्रेन आपको आपकी मंजिल तक पहुंचाती है लेकिन ट्रेनों में भीड़ को देखकर अच्छे-अच्छों के हौंसले फीके पड़ जाते हैं लेकिन क्या कर सकते हैं मंजिल तक पहुंचना है तो परेशानी तो झेलनी पड़ेगी।

आपके साथ भी अक्सर ऐसा हुआ होगा कि आप एक भीड़ से भरी हुई ट्रेन में रात में सफर कर रहे हैं। ट्रेन में पांव रखने की जगह नहीं है और आपको तेज पेशाब लगा है लेकिन आप फिर भी जा नहीं सकते क्योंकि ट्रेन के टॉयलेट में भी यात्री बैठे हैं। अब आप क्या करेंगे। आपकी मजबूरी है कि आप पेशाब को रोककर रात-भर बैठे रहेंगे। मेल तो फिर भी ठीक है कि ट्रेन से बाहर जाकर कर लेंगे लेकिन फीमेल का क्या? ऐसी स्थिति में आप किसको बोलोगो।

ऐसी स्थिति में कोई कुछ नहीं कर पाता। लेकिन एक व्यक्ति है जिसने इस परेशानी के कारण रेल्वे से जुर्माना वसूल लिया। जी हां। इस व्यक्ति को ठीक इसी तरह की समस्या हुई और इसी समस्या के चलते रेल्वे ने उसे 30,000 रूपए का जुर्माना दिया। बीबीसी पर छपी एक ख़बर के अनुसार भारत सरकार के कानून मंत्रालय के डिप्टी कानूनी सलाहकार देवकांत के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था।

साल 2009 में देव कांत ने अपने परिवार के साथ दिल्ली से अमृतसर जाने के लिए ट्रेन में रिजर्वेशन करवाया था। उन्होंने बताया कि लुधियाना के पास एक स्टेशन पर ट्रेन में काफी सारे लोग बिना टिकट के चड़ गए। ट्रेन का डिब्बा अब पूरी तरह भर चुका था, उसमें पांव रखने की भी जगह नहीं था। आलम यहां तक था कि टॉयलेट में भी लोग बैठे हुए थे।

उस दौरान उनके और उनके परिवार के लोगों को कई घंटों तक पेशाब रोक कर बैठे रहना पड़ा। उन्होंने बताया कि मैनें टीटीई से इस बारे में शिकायत की, लेकिन उन्होंने कहा कि वो इस मामले में कुछ नहीं कर सकते। 2010 में देव कांत ने रेल्वे मंत्रालय से इसकी शिकायत की थी। इसके बाद उन्होंने उपभोक्ता अदालत का रूख किया।

देवकांत कहते हैं कि उस समय भाग्य की बात थी कि मेरे पास कैमरा था तो मैने कुछ तस्वीरें लीं और वीडियो बनाया।’’ जिसके बाद मंत्रालय ने माना कि वो लोग टिकट के बिना डिब्बे में चढ़े थे, लेकिन रेल्वे का कहना था कि उन्होंने लोगों को अंबाला में ही उतार दिया था। और देवकांत का कहना है कि वो लोग दिल्ली तक गए थे।

इसी मामले में कोर्ट ने रेल्वे को दो साल पहले ही 30 हजार रूपए का हर्जाना देने का आदेश दिया था लेकिन रेल्वे ने इसका विरोध करते हुए अपील की थी। व कांत कहते हैं, “रेलवे से पैसा पाना मेरा उद्देश्य नहीं है, जिसकी ड्यूटी थी उसे कोई नोटिस नहीं भेजा गया, किसी को चेतावनी नहीं दी गई। हमारी व्यवस्था में किसी की ज़िम्मेदारी ही तय नहीं है।“ हमारे देश में विडंबना है कि, “इस छोटे से अधिकार के लिए भी हमें दर-बदर ठोकरें खानी पड़ती हैं।“ वो कहते हैं, “मैं तो क़ानूनी बैकग्राउंड से हूं तो मैंने सब्र रखा, लेकिन आम आदमी तो टूट जाता है।“

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