दुनिया भर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का दायरा तेजी से बढ़ रहा है, और इसके साथ ही युवाओं के मन में अपने भविष्य को लेकर एक गहरी चिंता भी घर कर गई है। आज के समय में ‘AI-प्रूफ’ करियर चुनना एक चलते हुए लक्ष्य पर निशाना लगाने जैसा हो गया है। गैलप (Gallup) के 2025 के एक हालिया सर्वे के मुताबिक, लगभग 70% कॉलेज छात्र AI को अपनी नौकरी की संभावनाओं के लिए एक बड़े खतरे के रूप में देखते हैं। 14 से 29 वर्ष के आयु वर्ग में इस तकनीक को लेकर लगातार संदेह और चिंताएं बढ़ रही हैं। आधे से अधिक युवा हर हफ्ते AI का इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन उन्हें इसके नुकसान भी नजर आ रहे हैं। सर्वे के अनुसार, 48% जेन ज़ेड कर्मचारियों का मानना है कि कार्यस्थल पर AI के संभावित खतरे इसके फायदों से कहीं ज्यादा हैं। इसी डर के चलते छात्र अब अपनी पढ़ाई और करियर की पूरी दिशा ही बदल रहे हैं।
इंसानी कौशल पर बढ़ता जोर ओहियो की मियामी यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाली 20 वर्षीय जोसेफिन टिम्परमैन की कहानी इस बड़े बदलाव का एक सटीक उदाहरण है। दो साल पहले जोसेफिन ने बिजनेस एनालिटिक्स को अपने मुख्य विषय के रूप में चुना था। उन्हें लगा था कि यह एक ऐसा खास हुनर है जो उन्हें कॉलेज के बाद एक अच्छी नौकरी दिलाएगा। लेकिन AI के आने से उनके सारे समीकरण बिगड़ गए। उन्हें जल्द ही समझ आ गया कि कोडिंग और सांख्यिकीय विश्लेषण जैसे जो बुनियादी काम वे सीख रही थीं, उन्हें मशीनें आसानी से कर सकती हैं। जोसेफिन का कहना है कि हर किसी को यह डर सता रहा है कि शुरुआती स्तर (entry-level) की नौकरियां AI छीन लेगा। उन्होंने कुछ हफ्ते पहले ही अपना विषय बदलकर मार्केटिंग कर लिया। अब उनकी रणनीति स्पष्ट है। वे उन चीजों पर ध्यान दे रही हैं जहां इंसान अभी भी मशीनों से आगे हैं, जैसे कि क्रिटिकल थिंकिंग (आलोचनात्मक सोच) और लोगों से बातचीत करने का हुनर। उनका मानना है कि सिर्फ कोडिंग आना काफी नहीं है, बल्कि रिश्ते बनाना और गहराई से सोचना ज्यादा जरूरी है, जिसे AI कभी रिप्लेस नहीं कर सकता।
बिना दिशा-निर्देश के आगे बढ़ता युवा छात्रों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि जिन विशेषज्ञों—जैसे प्रोफेसर, करियर सलाहकार या माता-पिता—से वे सलाह की उम्मीद करते हैं, उनके पास भी इस नई तकनीक का कोई ठोस जवाब नहीं है। शिक्षा क्षेत्र में काम करने वाली संस्था ‘लुमिना’ की उपाध्यक्ष कर्टनी ब्राउन बताती हैं कि छात्रों का विषय बदलना कोई नई बात नहीं है, लेकिन इसका मुख्य कारण AI का होना बेहद चौंकाने वाला है। असल में छात्र बिना किसी जीपीएस के खुद ही अपना रास्ता तलाशने को मजबूर हैं। शिकागो यूनिवर्सिटी से कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई पूरी करने वाले 22 वर्षीय बेन एयबार का अनुभव भी कुछ ऐसा ही रहा। उन्होंने सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग की लगभग 50 नौकरियों के लिए आवेदन किया, लेकिन उन्हें एक भी इंटरव्यू का बुलावा नहीं आया। इसके बाद उन्होंने हार मानने के बजाय कंप्यूटर साइंस में मास्टर्स करने का फैसला किया और साथ ही कंपनियों के लिए पार्ट-टाइम AI कंसल्टिंग का काम शुरू कर दिया। बेन के अनुसार, अब उन लोगों की बहुत मांग होगी जो AI का इस्तेमाल करना जानते हैं, लेकिन मानवीय तरीके से संवाद करने की क्षमता आज के दौर में सबसे ज्यादा मूल्यवान हो गई है।
आत्म-विकास का नया पैमाना नौकरियां छिनने की इस चिंता ने एक नए चलन को जन्म दिया है। जेन ज़ेड और मिलेनियल्स के लिए अब AI सीखना महज एक तकनीकी जरूरत नहीं रह गया है, बल्कि यह ‘सेल्फ-इम्प्रूवमेंट’ यानी आत्म-विकास का नया जरिया बन चुका है। पहले लोग ध्यान और व्यक्तिगत उत्पादकता जैसी चीजों पर समय बिताते थे। आजकल यह पीढ़ी AI में महारत हासिल करने के लिए अपना समय और पैसा निवेश कर रही है। युवा अब कंपनियों या सरकारों के भरोसे नहीं बैठे हैं कि वे उनके लिए नीतियां बनाएंगी या ट्रेनिंग देंगी। वे खुद आगे बढ़कर कोर्स कर रहे हैं। ‘कोर्सेरा’ की ग्लोबल स्किल्स रिपोर्ट 2024 के आंकड़े साफ बताते हैं कि “जेनरेटिव AI” से जुड़े कोर्सेज के दाखिले में 1,060% का भारी उछाल आया है, और इसकी कमान पूरी तरह से युवाओं के हाथ में है।
रोजमर्रा के काम और तकनीक की साझेदारी यह नजरिए में एक बहुत बड़ा बदलाव है, जहां ‘सेल्फ-हेल्प’ की जगह अब ‘सेल्फ-स्किल’ ने ले ली है। 59% जेन ज़ेड और 62% मिलेनियल्स का मानना है कि करियर में आगे बढ़ने के लिए AI स्किल्स का होना उतना ही जरूरी है जितना कि इंटरनेट या माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस चलाना आना। यह तकनीक अब उनके लिए एक दैनिक उत्पादकता भागीदार (productivity partner) बन चुकी है, जो उनके काम, पढ़ाई के शेड्यूल और यहां तक कि उनके वर्कआउट रूटीन को भी मैनेज कर रही है। फ्लिंडर्स यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन में सामने आया है कि 66% जेन ज़ेड कर्मचारियों के कौशल पर कार्यस्थल में AI के इस्तेमाल से सकारात्मक असर पड़ा है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि यह पीढ़ी डिजिटल नेटिव है, जो बचपन से ही तकनीक के बीच पली-बढ़ी है। अपने करियर को सुरक्षित रखने, नए अवसर पैदा करने और खुद को बदलते वक्त के सांचे में ढालने के लिए वे तेजी से AI को अपना रहे हैं।