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Friday, December 15th, 2017 09:10 PM
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ओशो से न मिले होते तो विनोद खन्ना बन जाते ‘महानायक’




ओशो से न मिले होते तो विनोद खन्ना बन जाते ‘महानायक’Entertainment

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आज जिस जगह बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन हैं वहां किसी और का पहुंचना मुश्किल-सा लगता है। आए दिन फिल्मों में कई एक्टर्स आते हैं पर चल नहीं पाते। एक दौर ऐसा भी था जब अमिताभ बच्चन फिल्म इंडस्ट्री में आए थे और संघर्ष करके इस मुकाम पर पहुंचे है। लेकिन उन्हीं के साथ एक और एक्टर था जो उन्हें बराबर की टक्कर दे रहा था। वो एक्टर अगर अपनी ज़िन्दगी में सिर्फ एक गलती नहीं करता तो आज अमिताभ की जगह शायद बॉलीवुड में उसका नाम होता। हम बात कर रहे हैं विनोद खन्ना की, जो एक समय अमिताभ के प्रतिद्वंदी हुआ करते थे। हम आपको उन्हीं के बारे में ख़ास बातें बताने जा रहे हैं।

विनोद खन्ना का जन्म 6 अक्टूबर 1946 पेशावर (पाकिस्तान) में हुआ था। बचपन में विनोद खन्ना काफी शर्मीले स्वभाव के थे। बचपन में स्कूल के दौरान एक टीचर ने उन्हें एक नाटक में जबरदस्ती उतार दिया था। उस समय उन्हें विनोद खन्ना की एक्टिंग काफी पसंद आई। इसके बाद जब वे बोर्डिंग स्कूल में पढ़ते थे तब उन्होंने ‘मुगल-ए-आज़म’ और ‘सोलवां साल’ जैसी फिल्में देखीं जिन्होंने उन पर गहरा असर छोड़ा।

कॉलेज के दिनों में विनोद खन्ना काफी हैंडसम दिखते थे। उन दिनों उनके कॉलेज की लड़कियों ने उनसे फिल्मों में अभिनय करने के लिए कहा। उन दिनों शायद विनोद खन्ना के लिए किस्मत की बात कहें, उनकी मुलाकात एक पार्टी में निर्माता और निर्देशक सुनील दत्त से हुई। सुनील दत्त उन दिनों फिल्म ‘मन का मीत’ के लिए एक नए चेहरे की तलाश कर रहे थे। इस फिल्म में वे अपने छोटे भाई सोमदत्त को उतारने की सोच रहे थे। विनोद खन्ना से मुलाकात के बाद सुनील दत्त ने उन्हें विलेन का रोल ऑफर किया। जिसे विनोद खन्ना ने स्वीकार कर लिया।

 

पिता ने तान दी बंदूक
विनोद खन्ना के लिए फिल्मों में आना इतना आसान भी नहीं था। उनके पिता एक बिजनेसमैन थे और चाहते थे कि उनका बेटा भी बिजनेस ही करे। लेकिन जब विनोद को फिल्म का ऑफर मिला और उन्होंने घर पर पिता को बताया तब उनके पिता ने उन्हें बहुत डांटा और उन पर बंदूक तानकर कहा कि ‘‘अगर तुम फिल्मों में गए तो तुम्हें गोली मार दूंगा।’’ बाद में विनोद खन्ना की माँ के समझाने के बाद उनके पिता ने दो साल तक फिल्म इंडस्ट्री में काम करने की इज़ाजत दे दी। लेकिन साथ ही ये भी कहा कि ‘‘अगर दो साल में तुम सफल नहीं हुए तो तुम्हें घर के बिजनेस में हाथ बंटाना पड़ेगा।’’

पहली फिल्म में ही हुए हिट
विनोद खन्ना को अभी हम लीड एक्टर के रूप में जानते हैं लेकिन अपने करियर के शुरूआती दिनों में उन्होंने विलेन के रोल निभाए थे। उनकी पहली फिल्म ‘मन का मीत’ 1968 में रिलीज़ हुई थी। ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट साबित हुई थी। इस फिल्म में विनोद कुमार की एक्टिंग को काफी सराहा गया। इसके बाद वे कई फिल्मो में बतौर विलेन ही काम करने लगे।

गुलज़ार ने बनाया हीरो
विनोद खन्ना ने अपने करियर की शुरूआत विलेन के रूप में कर तो ली थी। लेकिन वे दिखने में काफी हैंडसम थे। उन्हें हीरो के रूप में फिल्मी पर्दे पर आना चाहिए था। लेकिन जिस दौर में वे एक्टिंग कर रहे थे उस दौर में अगर कोई एक्टर विलेन बनकर आ गया तो उसे ज़िन्दगी भर विलेन ही बनना पड़ता था। उस समय उन्हें एक लीड हीरो के रूप में पहचान दिलाई गुलज़ार ने। गुलज़ार उन दिनों अपने निर्देशन करियर की शुरूआत ही कर रहे थे। उन्होंने अपनी फिल्म ‘मेरे अपने’ के लिए विनोद खन्ना को चुना। छात्र राजनीति पर आधारित इस फिल्म में मीना कुमारी ने अहम भूमिका निभाई थी। इसके बाद उनका करियर हीरो के रूप में चल पड़ा। वे एक के बाद एक सुपरहिट फिल्में देने लगे।

अमिताभ को दी थी टक्कर
विनोद खन्ना अपने करियर में आगे बढ़ रहे थे और एक के बाद एक सुपरहिट फिल्में दे रहे थे। लेकिन उनकी अधिकतर फिल्में किसी न किसी हीरो के साथ होती थी। उस समय अमिताभ बड़े फेमस थे और एंग्री यंग मैन की भूमिका में वे लोगों के दिलों में छा रहे थे। वहीं दूसरी ओर विनोद खन्ना भी बॉलीवुड में छा रहे थे। उन दिनों अखबारों में इन दोनों के बीच काफी प्रतिस्पर्धा रहती थी। इन दोनों को एक दूसरे का प्रतिद्वंदी कहा जाता था। इन दोनों में उस समय प्रतिस्पर्धा का माहौल तो था ही लेकिन विनोद खन्ना ने अमिताभ के साथ फिल्में करके अपने अभिनय को साबित किया। उन्होंने अमिताभ के साथ ‘अमर अकबर एंथॉनी’, ’परवरिश’ जैसी फिल्में कीं जिनमें वे अमिताभ को टक्कर देते नज़र आए।

बॉलीवुड से लिया सन्यास
विनोद खन्ना उन दिनों अपनी जगह अमिताभ के बराबर बना चुके थे और सफल एक्टर्स की गिनती में गिने जाने लगे थे। लेकिन तभी उनकी माँ का निधन हुआ और वो बहुत डिस्टर्ब हो गए। तभी वे आचार्य रजनीश (ओशो) से मिले। वे उनसे काफी प्रभावित हुए। 1980 के दशक में अचानक से विनोद खन्ना ने अपने फिल्मी करियर से सन्यास ले लिया और अमेरिका जाकर ओशो के आश्रम में रहने लगे। वे आश्रम में बगीचे के माली बन गए। ओशो ने उन्हें स्वामी विनोद भारती नाम दिया था। उस समय उनकी शादी गीतांजलि से हो चुकी थी और उनके दो बेटे अक्षय व राहुल थे। सन्यास लेने के बाद इन दोनों का तलाक हो गया था।

फिर से की बॉलीवुड में वापसी
जब विनोद खन्ना का ओशो से मोह भंग हुआ तो उन्होंने फिर से बॉलीवुड का रूख किया। 1987 में वे पुनः बॉलीवुड लौटे। लेकिन जिस तरह उन्होंने पहले बॉलीवुड में मुकाम बनाया था उस तरह फिर से बॉलीवुड में आना उनके लिए आसान नहीं था। फिल्मकार मुकुल आनंद ने उन्हें लेकर ‘इंसाफ’ और राज सिप्पी ने उन्हें लेकर ‘सत्यमेव जयते’ बनाई लेकिन दोनों ही फिल्में बॉक्स पर फ्लॉप रही। 1990 में उन्होंने कविता से शादी की। अभी उनकी दो बेटियां साक्षी और श्रद्धा हैं।

राजनीतिक करियर
वर्ष 1997 और 1999 में वे दो बार पंजाब के गुरदासपुर क्षेत्र से भाजपा की ओर से सांसद चुने गए। 2002 में वे संस्कृति और पर्यटन के केन्द्रीय मंत्री भी रहे। सिर्फ 6 माह पश्चात् ही उनको अति महत्वपूर्ण विदेश मामलों के मंत्रालय में राज्य मंत्री बना दिया गया।

बॉलीवुड में उनकी वापसी ज्यादा कमाल तो नहीं कर पाई। कुछ दिनों पहले वे दबंग फिल्म में सलमान के पिता का रोल निभाते नज़र आए थे। कुछ सालों पहले ही उन्होंने पाकिस्तानी मूवी भी की थी। वे कई सारे टीवी सीरियल्स में भी नज़र आ चुके हैं।

काफी समय से राजनीति और बॉलीवुड में सक्रिय रहने के बाद विनोद खन्ना की अचानक एक फोटो इंटरनेट पर वायरल हुई थी, जिसमें वे काफी गंभीर हालत में नज़र आ रहे थे। अंततः 27 अप्रैल को मुंबई में उनका निधन हो गया। जानकारी के अनुसार वे कैंसर से पीड़ित थे। बॉलीवुड के इस महानायक को शत-शत नमन।

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