Sunday, November 19th, 2017 08:11 PM
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#ChildrensDay: बचपन में ही क्यूँ खो रहा है बचपना?




#ChildrensDay: बचपन में ही क्यूँ खो रहा है बचपना?Social

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खिलखिलाती हंसी, बेपरवाह सी भागमभाग, शरारते, रूठती इठलाती पर फिर मनाने पर झट से मान जाने कि आदतें, यही सब तो बच्चों का बचपना होता है. बचपन की उम्र एक ऐसी शुरूआती अवस्था होती है जीवन की, जिसमे बच्चा सीखता तो है पर अपनी बेपरवाह और बेखौफ़ खिलखिलाहट के साथ और साथ साथ बड़ों की डांट-डपट भी होती थी.

आज बाल दिवस है, नेहरु जी की याद दिलाने बाला दिन. बालदिवस एक ऐसी शख्सियत की याद दिलाने बाला दिन, जो बहुत लज्जत से रहते थे लेकिन बच्चो को असीम प्यार करते थे. और यही कारण है कि यह दिन बचों को समर्पित है.

बाल दिवस का यह दिन उन बच्चो की भी याद दिलाता है, जो बेवाक थे जिनकी आँखों में सपने तैरते थे किन्तु ये सपने किसी टैलेंट हंट शो में टॉप आने के नहीं थे, ना ही कॉम्पटीसन में अच्छा स्कोर करने के थे. बच्चों के सपने तो उनके बचपने जैसे ही होते थे. उनके सपने पतंग उड़ाने के होते थे और उस पतंग के साथ खुद आसमान में उड़ने की कोरी कल्पनाओं के भी.

आज बाल दिवस है पर क्या वो बचपना भी है? जरा सोचिये…

अब बो दिन नहीं रहे, अब बच्चे बचपन में ही समझदार हो गए हैं बड़े हो गए हैं. अब बो कोरी कल्पनाएँ नहीं करते, हाँ लेकिन दूसरो की कल्पनाओ से बनी दुनिया में खो गए हैं. आज वो दूसरो की कल्पनाओ को सहेजते हैं उनके बनाये वीडियो गेम खेलते हैं, लेकिन क्या ये बनी बनाई, बाजार में बिकने वाली कल्पनाएँ वीभत्स नहीं हैं? आज टेक्नोलॉजी के इस भागते दौड़ते दौर में जो वीडियो गेम बच्चों के हांथो में मिलते हैं उस गेम में इनका नायक गोलियां चलाता है दूसरो को अपनी गाड़ी से रौंद देता है। क्या असर होता होगा बचों के दिमाग पर?

किन्तु हाँ आज के इस माहौल में सिर्फ बच्चो को दोष देना बिलकुल सही नहीं होगा क्योंकि बच्चे सच में बच्चे ही होते है फिर वो किसी भी दौर के क्यों न हो, बिलकुल कोरे कागज की तरह. उनके लिए हम जैसा माहौल उबलब्ध कराते हैं वो उसमे ही ढल जाते हैं. अल्बर्ट आइस्टीन ने कहा था कि अगर आप अपने बच्चों को बुद्धिमान बनाना चाहते हैं तो उन्हें परियो की कहानी सुनाये और अगर और जायदा बुद्धिमान बनाना चाहे तो और ज्यादा परियो की कहानीयां सुनाये, लेकिन क्या आज माता पिता उन्हें सच्चे और अच्छे चरित्रों से बाकिफ करा पा रहे हैं? उन्हें दादी और नानी से मिलने वाली सच्ची सीखें मिल रही हैं? अगर नहीं तो फिर बच्चों का दोष कहाँ हैं?

आज के समय में तो माता पिता खुद बच्चों पर अच्छे मार्क्स लाने की जिम्मेदारी, भविष्य में क्या बनना है और कितना कमाना है ये अभी से सोचने कि ललक को बढ़ावा दे रहे हैं. ये सही है कि बचों ओ पथ-भ्रष्ट नहीं होना चाहिये पर सफलता की दौड़ में बचपना भी नहीं खोना चाहिए. बचों ओ बचपन में जीने कि सीख भी आज के समय में मिलना जरुरी है, कही ऐसा ना हो के वो अपने बचपन को मन के किसी कोने में दबाये हुए अपना जीवन बिताएं और परिवार व समाज से दूर होते जाएँ.

इस विषय को लेकर हमनें कुछ एस्पर्ट्स से भी बात की तो उनका कहना कुछ इस प्रकार है।

By-Vinita Cornelius
Administrator and Coordinator
Standard Public School
Expert in child psychology

आज के समय में जो कुछ भी हो रहा है वो आज के बच्चों के नेचर में आये बदलाबों के लिए पूरी तरह से जिम्मेदार है. मैं यहाँ बात कि शुरुआत करुँगी बच्चे के जन्म से, आज जब एक महिला गर्भवती होती है तो उसे अच्छे और शांत माहौल में रहने की सलाह दी जाती है क्यूंकि गर्भ में भी बच्चे पर बाहर के वातावरण का बहुत असर पड़ता है. आज चारो तरफ शोरगुल है ध्वनि प्रदुषण है जो गर्भ में ही बच्चे पर असर डालता है और जब वो इस दुनिया में आता है तो भी उसे अपने आस पास का वातावरण और माहौल बिगड़ा हुआ मिलता है और बच्चा चिडचिडा और उग्र हो जाता है.

आज के समय में परिवार कि अहमियत बहुत कम हो गयी है लोग होड़ में भाग रहे हैं. संयुक्त परिवार बहुत कम हो गए हैं, और एकल परिवार में माँ और पिता को समय ही नहीं है अपने बच्चे के साथ अच्छा समय बिताने का. जिससे बच्चे में एक कड़वाहट आ जाती है. पहले संयुक्त परिवार में अगर बच्चे के माँ पिता के बीच कोई बात होती थी तो बाकी परिवार उसे सँभालने के लिए संस्कारित करने के लिए रहता था. बच्चे शेयरिंग सीखते थे. लेकिन आज का माहौल सिर्फ सेल्फिशनेस का बन गया है. और बच्चे को जैसा माहौल मिलेगा वो उस में ही ढल जायेगा. पहले घर बड़े होते थे तो जो भी लड़ाई झगड़ा होता था वो बच्चों से अछूता रहता था लेकिन आज घर और परिवार दोनों छोटे हो गए हैं तो बच्चा ना चाहते हुए भी वो सब  देखता है जो उसे नहीं देखना चाहिये. उसके सामने ही परिवार आपस में एक दूसरे पर चिल्लाते चीखते है तो बच्चों में भी वही सब देखने को मिलता है. आज सोसाइटी भी ऐसी है जहाँ पर बच्चों को कड़वाहट और कठोरता ही देखने को मिलती है. बच्चे का बचपना हो या फिर टीनेज कि अवस्था हो उसे अपने माता पिता का अमूल्य समय कि जरुरत होती है लेकिन आज के समय में माता पिता अपने कामों में ही लगे रहते हैं और पैसों की रेस में भागते रहते हैं बच्चा घर आता है तो माइक्रोवेब में गर्म कर या फिर बाई के हाथों से खाना ले कर खा लेते हैं.

पैसा आज रिश्तों पर भारी पड़ रहा है. बच्चों में भी यही भावना आना स्वाभाविक है वो भी आज पैसों को ज्यादा महत्त्व देते हैं, संस्कारों को कम. बच्चो को प्यार और परिवार के समय कि जरुरत है जो उन्हें नहीं मिलता यहाँ तक की स्कूलों में भी टीचर्स पर बहुत ज्यादा काम का बोझ रहता है वह भी किसी को समय नहीं है कि बच्चे से पूछा जाए कि उसकी परेशानी क्या है? पहले जब हम कार्टून देखते थे परियों कि खानी सुनते थे तो सीखते थे लेकिन आज कमे कार्टून और बच्चों के लिए बनाये जाने वाले कार्यक्रम भी बहुत ही भद्दे हैं जिनसे शायद ही बच्चा कुछ सीखता है लेकिन फिर भी माता पिता बच्चों कि शरारतों से बचने के लिए और शांति बनाये रखने के लिए उन्हें इस कार्टून्स को देखने देते है वो ये भी जानने कि कोशिश नहीं करते कि बच्चो पर क्या असर हो रहा है.

आज का समय टेक्नोलॉजी का है और बच्चों को कम्प्युटर, मोबाइल आसानी से मिल जाते हैं, और आज बच्चे को माँ कि गोद में सर रख कर सोने कि फुर्सत नहीं है और ना ही माँ के पास समय है उनको दुलारने का. मैं तो अपनी माँ कि गोद में सर रख कर बैठती थी और सो जाती थी. लेकिन आज यह सब बहुत कम देखने को मिलता है. जिससे बच्चों में वो कोमलता नहीं रही है. आज बच्चे को स्कूल में भारती कर तो दिया जाता है लेकिन वो अपने आस पास के माहौल से अपने आप ही सीख रहा है जिसका असर बहुत घातक है. टेक्नोलॉजी कि वजह से बच्चे सेल्फ एजुकेट हो रहे हैं, यहाँ तक कि बच्चों के रोल मोडल भी उनके परिवार में नहीं बहार के होते हैं.

आज इन सब समस्यायों से बच्चों को बचाने के लिए बच्चों को क्वालिटी टाइम देना जरुरी है. बच्चो को सही सीख देने के लिए माता पिता और सोसाइटी को इस टेक्नोलॉजी के इस युग में ज्यादा ज़िम्मेदार होने कि जरुरत है. उन्हें बाहर निकला कर प्रकृति को समझना और महसूस करवाना जरुरी है.

 

By- Venus viswambharan
Trainer and language tutor

Due to academic pressures and school pressures the kids of today have lesser time to play. Play which we consider free unstructured play. Where they play with abandon no seriousness and absolute uninhibited joy .

We know the advantages:
1.Play helps a child know their own strengths and inclinations, do they like to play as a goal keeper in football , or a bowler in cricket…

2.The learn to control what they need to  push what they must hold back, just in the same way  as when they hit the right curve in the most appropriate angle with a little finer control in the kick but maybe a little more acceleration when they run towards the ball. They learn to come up with strategies and solutions.

3. They learn to handle again other internal factors when they know they need to give their best, example handle their sleep and hunger better so they can play better. They handle their emotions like anger and even overcome fear so as to continue to play together.

4. All the energy expenditure , fresh oxygen intake and consistent alertness  which they  adopt during play helps keep them fit , helps exercising their faculties for sharpened focus and concentration and helps allay – depression, anxiety, nervousness and in fact  many other health disorders .
5. Lastly they learn team spirit, and how to work together with cooperation.

Ok that being said i am not ready to get on to the complaining or whining band wagon , where in all of us complain about what is not available. Where does that lead us? Absolutely no solutions!

The given being – “less play time” , how can we make the most of it ? Should we complain ? Fight the system ? Or find ways to intelligently make what is available -beneficial ?
Everything in life has changed, has advanced, just like technology which was considered an evil is now a big important factor of our lives today.

So how can we Get creative about this situation?

1. Allow kids to choose the subjects they like, and empower them to handle subjects that they cant cope with , but creatively, let the kids brainstorm… believe me they find awesome solutions. Like recording a lesson for themselves and their friends, this way they learn to not just make it simpler but save time up for play.

2. Let each child with strengths help the others, here they learn team play or working together and they learn to hone their own skill maybe writing, poetry, math or even design… using their own skills to make things easier.

3 we need as parents and teachers to stop grumbling and protesting that the kids have a lot to study and no time to play. Instead we need to join them in infusing fun through intelligent ways so as to simplify their day, especially when they have emotional outbursts, so that they learn to always find solutions to all these internal factors, and even plan the other activities better in their day so as to save time. They then learn to percolate this habit into all areas of their lives.

4. Introduce some activity like jogging, yoga or dance which they enjoy and which helps with oxygen intake , focus and concentration. We as parents need to model the same choosing exercise , cycling, jogging outdoor activities to becoming a couch potato.

5. When we as a family get involved and get neighbours or other friends and their families involved as well in energetic fun we automatically captivate and allure kids to follow suite.

Yes there are drastic changes today and maybe this is what evolution is, we need to assist and think creatively to progress evolution instead of putting up our hands and lamenting about what is lost.

Content By- Priya Bundela

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