page level


Thursday, January 18th, 2018 01:02 PM
Flash
15/01/2018

शिक्षा और चिकित्सा को सेवा कार्य से हटकर लूटने की दुकान बना दिया




शिक्षा और चिकित्सा को सेवा कार्य से हटकर लूटने की दुकान बना दिया

Sponsored




शिक्षा का क्षेत्र हो या चिकित्सा का क्षेत्र दोनों ही इस मंदी के दौर में सबसे अधिक कमाने वाले साधन बने हुए हैं। जहां व्यापार-व्यावसाय में सभी तरफ मंदी बनी हुई है वहीं ये वे क्षेत्र हैं जहां काम करने वालों को फुर्सत ही नहीं है। कमाई इतनी की समेटे ही नहीं जा रही है। जबकि एक समय था ये दोनों सेवा कार्य करने वाले क्षेत्र हुआ करते थे। इन्हें ट्रस्ट या समाज या कोई एनजीओ ही संभालता था यहा सेवा देना ही प्रमुख माना जाता था। सिर्फ और सिर्फ क्वालिटी एजुकेशन ही बेस होता था।

शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाला हर व्यक्ति इस भावना से काम करता था। बच्चों को अच्छे संस्कार देना उनको उस लायक बनाना कि वह अपनी स्वयं की ज़िन्दगी से समाज, राष्ट्र और विश्व का उत्थान कर सकें और एक अच्छे भविष्य की नींव रख सकें। यही वजह है कि उस समय के शिक्षकों का सम्मान सबसे अधिक माना जाता था। वे अपने कार्य पर गर्व करते थे। जर्मनी में शिक्षकों की तनख्वाह सबसे अधिक है। वहां के डॉक्टर्स, इंजीनियर्स ने एक बार हड़ताल कर मांग की कि हमारी तनख्वाह भी शिक्षकों के जितनी हो जाए। वहां की चांसलर एंजेला मार्केल ने यह कह कर उनकी मांग को खारिज कर दिया कि जिन्होंने आप सभी को इस लायक बनाया उनके बराबर आप कैसे हो सकते हैं। शिक्षकों की क़ीमत का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है।

किंतु जबसे इसका व्यावसायीकरण हुआ है सिर्फ और सिर्फ पैसे की भाषा बोली और समझी जाती है। सरकार से लेकर आम व्यक्ति तक अब सिर्फ पैसे, स्टेट्स, सुविधाओं की तरफ बढ़ गया है। वहां संस्कार, जीवन रूपी ज्ञान, मानवता का कोई स्थान नहीं बचा है। वे सब सिर्फ कहनेभर के रह गए हैं। अब और अब विषयाज्ञत ज्ञान और उससे मिलने वाला पैकेज दिखलाई पड़ता है। सरकार भी सिर्फ ऐसे ही स्कूल खोलना चाहती है और पैरेंट्स भी अपने बच्चों के लिए ऐसा ही चाह रहे हैं। फिर बच्चों की स्कूल में एक्सीडेंटल मौत हो या ड्रग्स की लत हो या वो भी बड़ा होकर मां-बाप, घर-परिवार से अलग अपना पैसों का महल खड़ा कर रहा हो ‘इतनी चिल्ला पों क्यों?’

भ्रष्टाचार में लीन, समाज और देश की ना सोचकर स्वंय के विकास की बात करता हो या डॉक्टर बन हैवानियत का नंगा नाच करता हो, हमें चुप ही रहना चाहिए क्योंकि बोलने का कोई हक नहीं है। ये सभी हमारा ही बोया हुआ है, जिसे हम काट रहे हैं। पढ़ने और सुनने में बुरा लगेगा किंतु हकीकत यही है।

आज हम सभी अतिविकसित होकर फिर वही जंगल राज की तरफ आ चुके हैं, जहां जान की कोई क़ीमत नहीं है। मानवता दम तोड़ चुकी है। हम फिर संस्कार विहीन होकर जंगली हो चुके हैं। बस बदलाव है तो उपर के कलेवर का। सुंदर कपड़ों में लिपटे हैं। बदलाव लाना है, बच्चों के भविष्य को सही मायनों में अच्छा करना है तो पहले अपनी सोच में बदलाव लाओं। इन क्षेत्रों को पुनः कमाने का साधन बनाने की बजाया सेवा का ध्येय बनाओं। अपने जीवन में पैसों से ज़्यादा मानवता, अच्छे संस्कारों को महत्व देना सीखों। संस्कार से लेकर आम व्यक्ति तक की सोच में बदलाव आएगा तभी हम बच्चों को अच्छा भविष्य दे पाएगा और सही अर्थों में उनके प्रति हमारा सर्मपण दिखलाई देगा।

यह भी पढ़ें-

युवा दिवस : नरेन्द्रनाथ से स्वामी विवेकानंद हो जाना

राजनैतिक पार्टियों की हुई हार, ‘नोटा’ हुआ असरदार

‘शिव’ राज में खुले में शौचालय जाने को मजबूर है ये हॉकी प्लेयर

 

Sponsored






Loading…

Related Article

No Related Article

Subscribe

यूथ से जुड़ी इंट्रेस्टिंग ख़बरें पाने के लिए सब्सक्राइब करें


Select Categories