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Wednesday, September 19th, 2018 06:53 AM
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विघटनकारी परिवेश में समावेशी सियासत का अलख जगाइए




विघटनकारी परिवेश में समावेशी सियासत का अलख जगाइएPolitics



भारत के विघटनकारी राजनैतिक परिवेश में समावेशी सियासत की बात छेड़ना किसी अतिरिक्त सियासी जोखिम को उठाने के जैसा था। लेकिन बीजेपी नेता अटल बिहारी बाजपेयी ने तब इसे बखूबी उठाया और सियासत के शीर्ष पद प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे। तमाम किन्तु-परन्तु के बीच देश-विदेश में जो लोकप्रियता हासिल की, वह अपने आपमें एक मिसाल है। यही वजह है कि उनके गुजर जाने के बाद लोगों को यह एहसास हुआ है कि अब उनकी समावेशी सियासत को सफल बनाने का दारोमदार आगे किस पर होगा?

स्वाभाविक जवाब है कि बीजेपी और उसके नए पीएम नरेंद्र मोदी पर होगा और है भी। तमाम सियासी विडम्बनाओं से दो-दो हाथ करते हुए विगत चार वर्षों से वे यही तो कर भी रहे हैं। यह बात दीगर है कि उनका अंदाज अलग है और अलबेला भी। यदि बाजपेयी जी कोमा में नहीं गए होते तो जरूर उन्हें सराहते। स्वीकार करते कि राजधर्म के जिस मर्म को वे समझाना चाहते थे, मोदी जी ने उसे भलीभांति आत्मसात कर लिया है। उनका कोई भी कदम वर्ग विशेष के लिए नहीं, सभ्यता विशेष के लिए अहम है जो समावेशी नीतियों के बिल्कुल करीब है।

दरअसल, समावेशी सियासत और समावेशी विकास एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। यदि भारतीय सिक्के का उदाहरण दें तो बस इतना समझ लीजिए कि आगे वाला अशोक स्तम्भ समावेशी सियासत है और पीछे वाला मौद्रिक अंक समावेशी विकास। ख़ास बात यह कि जैसे सिक्का दर सिक्का मौद्रिक अंक बदलते रहता है, उसी तरह से समावेशी विकास का चढ़ता-उतरता सूचकांक भी। लेकिन समावेशी सियासत एक उदारमना सोच-समझ है। इसलिए यह शाश्वत है, अपरिवर्तित है।

समावेशी राजनीति की प्रासंगिकता प्रायः हर कालखण्ड में यथावत बनी रही है और रहेगी भी। तभी तो पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी आजीवन इसके प्रबल हिमायती रहे। उन्हें जब भी, जहां भी मौका मिला, बेधड़क इसे लागू किया। सत्ता शीर्ष पर पहुंचने के बाद भी वो इसके समर्थक बने रहे। मन से, विचार से और कर्म से। इसलिए उनके गुजरते ही यह सवाल पुनः प्रासंगिक हो उठा है कि मौजूदा विघटनकारी परिवेश में उनकी समावेशी सियासत की बात अब किस हद तक आगे बढ़ पाएगी।

बेशक, बाजपेयी के समावेशी सियासत के महत्व का पता इस बात से भी चलता है कि उनके परवर्ती प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने अपने दस वर्षीय कार्यकाल में समावेशी विकास को ही सबसे ज्यादा तरजीह दी, जबकि कांग्रेस उनकी नीतियों की विरोधी पार्टी समझी जाती थी और है भी। विशेष बात यह कि डॉ सिंह उच्च कोटि के अर्थशास्त्री भी हैं, जबकि बाजपेयी जी के साथ ऐसा कोई तमगा नहीं लगा था। और डॉ सिंह के परवर्ती प्रधानमंत्री और बाजपेयी के अनुयायी नरेंद्र मोदी ने भी ‘सबका साथ-सबका विकास’ नारे के तहत समावेशी सियासत और समावेशी विकास दोनों को एक साथ साधने की पूरी कोशिश की। उनकी जद्दोजहद आज भी जारी है।

सच कहा जाए तो चाहे दुनिया का कोई भी देश हो, यदि वह अपने लोगों के समग्र उत्थान के लिए बिना भेदभाव वाली एक समान नीतियां बनाता है तो समावेशी सियासत और समावेशी विकास की बात स्वतः साकार होने लगती है। दरअसल, किसी भी लोकतंत्र में ये दोनों स्थितियां महज अंकों का खेल भर हैं; न इससे कुछ कम और न ही कुछ ज्यादा। तभी तो, किसी भी लोकतांत्रिक प्रशासक से यह अपेक्षा की जाती है कि वह बहुमत या अल्पमत में उलझे बिना सर्वसम्मति से समावेशी राजनीति को तरजीह देते हुए समावेशी विकास की कोशिश करे।

शायद यही सोचकर अस्थायी विधायिका के सक्रिय सहयोग के लिए स्थायी कार्यपालिका की परिकल्पना की गई है और उसे मूर्त रूप भी दिया गया है। दोनों के बीच किसी भी तरह के मतभेद को निपटाने के लिए स्वतंत्र न्यायपालिका भी बनाई गई है। तीनों पक्षों की गतिविधियों से लोग सुपरिचित रहें, इसलिए स्वतन्त्र मीडिया को भी समान महत्व मिला है। सत्ता पक्ष के साथ-साथ विपक्ष की परिकल्पना हो या फिर सिविल सोसाइटी और एनजीओज के माध्यम से जनसेवा की भावना को साकार करने की ललक, आम लोगों की सुख-शांति-समृद्धि के लिए बहुत कुछ सोचा, समझा, किया गया है।

लेकिन सत्ता पक्ष और विपक्ष के घाती-प्रतिघाती खेल में समावेशी सियासत और समावेशी विकास की पवित्र अवधारणा को व्यवहारिक अमलीजामा पहनाना कठिन नहीं तो मुश्किलों भरा जरूर हो चुका है। क्योंकि विकास और जनसेवा के एजेंडे से आम आदमी अब बहुत दूर धकेला जा चुका है। जीवन का अधिकांश क्षेत्र व्यवसाय बना दिया गया है जहां लाभ की अवधारणा सर्वोपरि है। बिना सियासी श्रम किए बहुमत प्राप्ति के जुगाड़ हेतु आम आदमी को कभी उच्च वर्ग, मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग में बांटा गया, तो कभी दलित-आदिवासी, पिछड़ा और अल्पसंख्यक करार देकर लाभान्वित करने की कोशिश की गई ताकि वोट बैंक सही सलामत रहे।

आमतौर पर सत्ता चाहे कांग्रेसियों की रही या वामपंथियों की, समाजवादियों की रही या दलितवादियों की, या फिर राष्ट्रवादियों की, हर किसी ने लोगों को जाति, धर्म, क्षेत्र के आधार पर बांट करके देखा या फिर भाषा, लिंग, वेशभूषा (संस्कृति) के आधार पर विभाजित करके, लेकिन कुठाराघात तो समावेशी सियासत पर ही हुआ और होगा भी। यही वजह है कि समावेशी विकास की परिकल्पना भी धरी की धरी रह गई। कमोबेश भारत में भी यही हुआ। आजाद भारत में आम आदमी को एक समान सुविधाएं-सहुलियतें-जनसुविधाएं देने की कभी नहीं सोची गई।
आलम यह कि कानून भी जातीयता, साम्प्रदायिकता, क्षेत्रवाद और लिंगवाद को प्रोत्साहन देने वाले बनाए गए।

सच कहा जाए तो देश को सिर्फ राजनैतिक आजादी मिली जिससे भूगोल विखण्डित हुआ। लेकिन मुगलों और अंग्रेजों की वैचारिक दास्तां से उन्मुक्ति के बाबत कभी सोचा ही नहीं गया। क्योंकि बिना कुछ किए-धरे बहुमत की प्राप्ति के लिए फूट डालो-शासन करो की नीति लोकतांत्रिक शासकों को भी रास आई। सबने आपसी भेदभावमूलक नीतियों को आगे बढ़ाया जिससे देश कहीं संगठित अपराध तो कहीं नक्सलवाद और कहीं आतंकवाद की वैचारिक कालिमा से घिरता चला गया। जब राजनीतिक-सामाजिक हिंसा-प्रतिहिंसा का हर ओर बोलबाला हो गया, तब बाजपेयी का समरस स्वभाव सबको रास आने लगा। वो सबको भाने लगे। उनके समावेशी बोल सबको पसन्द आने लगे। यही समावेशी सियासत बन गई और फिर नीतिगत समावेशी विकास। लेकिन आज भी इसकी राह में चुनौतियां ज्यादा हैं, उपलब्धियां कम। कहीं श्रम तो कहीं तकनीक हावी है या फिर रोड़े बन चुकी है।

यही वजह है कि जब समावेशी सियासत के सूत्रधार पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी गुजर गए, तो उनके गुजरते ही विपक्षियों ने मुद्दा उठाया कि अब समावेशी सियासत की बात कौन करेगा? जबकि ऐसी किसी भी सम्भावनाओं पर पहले कांग्रेस ने बज्रपात किया, फिर वामपंथियों, समाजवादियों और राष्ट्रवादियों ने तुषारापात! सवाल है कि क्या मौजूदा विघटनकारी सियासी परिवेश में यह सम्भव है?

मुझे तो नहीं लगता, क्योंकि खुद को हिंदूवादी पार्टी कहने वाली बीजेपी भी अब आम आदमी की कम, दलित, आदिवासी, पिछड़ी और अल्पसंख्यक जातियों की चिंता ज्यादा कर रही है, जबकि गरीब सवर्णों की स्थिति किसी भी मायने में उनसे बेहतर नहीं है। शायद यही सब करके तो कांग्रेस के बुरे दिन आ गए।
इसलिए यह देखना दिलचस्प रहेगा कि नीतिगत रूप से कांग्रेस की उलटबासी करके बीजेपी के अच्छे दिन आएंगे अथवा लद जाएंगे। क्या मोदी भी बाजपेयी की तरह दूसरा पूर्ण कार्यकाल नहीं देख पाएंगे? इस बात में कोई दो राय नहीं कि समावेशी सियासत और समावेशी विकास की नीतियों से समतामूलक समाज का निर्माण किया जा सकता है, बशर्ते कि दलित, आदिवासी, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्ग के नेता जागरूक हों और सवर्ण नेता उनका सहयोग करें।

सवाल है कि क्या बाजपेयी की परवर्ती सियासी पीढ़ी, समावेशी सियासत जैसी उनकी उदारमना सोच को इस धरा पर उतार पाएगी? क्योंकि यह दूरगामी सोच न केवल भारत बल्कि पूरे विश्व के लिए प्रासंगिक थी, है और रहेगी। अब भी वक्त है कि भारत के लोग क्षुद्र सियासत से उबरें और बाजपेयी के मानवीय आदर्शों को आत्मसात करते हुए युग परिवर्तन का आह्वान करें। उनके जनमहाकाव्यों को सम्पादित करके गाने योग्य बनाएं। इससे सिन्धुत्व, हिंदुत्व, भ्रातृत्व और पारस्परिक ममत्व को पुनर्प्रतिष्ठित करने में मदद मिलेगी। सम्भवतया इन सबके बिना हिंदुत्व अधूरा था, है और रहेगा भी।

लेखक : कमलेश पांडे

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