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Thursday, September 20th, 2018 01:11 AM
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आईसीयू में इलाज पर भी लाडों से भेदभाव




आईसीयू में इलाज पर भी लाडों से भेदभावHealth & FoodSocial



तमाम कोशिशों के बाद भी समाज में बेटों को लेकर लगाव बेटियों की जान का दुश्मन बना हुआ है। एक ओर सरकार कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए कई योजनओं पर काम कर रही है। तो दूसरी और जन्म के बाद भी उनकी जान सांसत में है। केन्द्रीय स्वस्थ एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के देश भर की नवजात चिकित्सा इकाईयों (एसएनसीयू) में 3 वर्षो के आकड़ों के अनुसार अगर नवजात बच्ची की डिलेवरी प्रीमैच्योर या कमजोर पैदा हुई है। तो माता-पिता उसके इलाज को लेकर अनिच्छुक दिखे।

आकलन के अनुसार बेटों और बेटियों भर्ती कराने में 60: 40 का अनुपात 53-47 से नीचे नहीं होना चहिए। यूनिसेफ के अनुसार 2016 में 6।4 लाख बच्चों की मौत के साथ भारत में सबसे ज्यादा बच्चों की मौत हुई है। वर्तमान में शिशु मिर्त्यु दर प्रति एक हजार पर 39 है।

सांसत में जान

एक जनवरी 2013 से 14 फरवरी 2017 के बीच मुफ्त इलाज के बावजूद 700 एस एन सी यू में 40 .82 फीसदी यानि बेटियों जबकि 59. 13 फीसदी बेटे भर्ती कराए गए।

एसएनसीयू में बेटियों को इलाज (सूत्र- यूनिसेफ)

केरल:45%
महाराष्ट्र: 44
छत्तीसगढ़ : 43
मध्य परदेश : 39
राजस्थान: 38

2 .1 करोड़ बेटियां है अवांछित

स्वस्थ विभाग के ये आकड़ें इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी साल आर्थिक सर्वे में यह खुलासा हुआ था। कि देश में 2.1 यह खुलासा हुआ था। करोड़ बेटियां अवांछित हैं यानि ऐसे माँ बाप जो बेटा चाहते थे लेकिन बेटी हो गई ऐसे दंपति तब संतान पैदा करते हैं जब तक उनकी अभिलाषा पूरी नही हो जाती ऐसे में बेटियों के साथ भेदभाव बढ़ता जाता है।

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