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Sunday, December 17th, 2017 04:16 AM
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संस्मरण : वादी से रिसता प्रेम का कहवा…




संस्मरण : वादी से रिसता प्रेम का कहवा…Travel

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ : जब भी प्रेम के गीतों का बखान होगा, जाफरान की तासीर का तरन्नुम बनेगा, कश्यप की धरती का गुणगान होगा, शंकराचार्य की जुबानी कही जाएगी,लालचौक से क्रांतिसूत्र माँगा जायेगा, डल झील से टपकते पानी की बात होगी, शिकारों और तैरनेवाले घर ( हॉउस बोट) की सर्द रातों को याद किया जायेगा, चश्मे शाही में पत्थरों से रिसते पानी की चाह होगी, मुग़ल गार्डन को जेहन में उतारा जायेगा, विश्वविद्धयालय से शिक्षा की अजान होगी, फूलों के महकने को जब जीवन में उतरता देखा जायेगा, तब बेशक वादी की बर्फ से लेकर कहवे की महक का जायका लेकर कश्मीर की क्यारियों को ही याद किया जायेगा |

हाँ मैं अब तक उसी कहवे के स्वाद में खोया हूँ जिसने अनजान से शहर श्रीनगर में नए रिश्तों को बना कर मुझे तन्हा नहीं होने दिया | और हाँ सबसे खास बात कभी न भूल पाने वाले पलों में एक वादी का वो प्यार भी हैं जो मुझे हमेशा कश्मीर की तरफ खीचने के लिए काफ़ी हैं |
बहुत कुछ सुना था, इंदौर से दिल्ली तक की यात्रा में कश्मीर के बारे में, पेशे से पत्रकार होने के कारण बहुत कुछ लिखा हुआ ही पढ़ पाया था घाटी के सौन्दर्य के बारे में और हालातों का वही रोजमर्रा वाला हालचाल जो सियासत दुनिया को दिखाना चाहती हैं| पर दिल्ली से श्रीनगर की महज १ घंटा २५ मिनिट की उड़ान के बाद जो आँखों से कश्मीर को देखा और जाना वो कही अलग था | कमोबेश मैं विश्वास ही नहीं कर पा रहा था कि क्या मैं वाकई कश्मीर में ही उतरा हूँ या फिर कहीं और …| क्योंकि कश्मीर के बारे में जो सुना या पढ़ा वो सब कोरी हवा हवाई ही थी | क्योंकि वादी के निश्चल प्रेम और मिठास के साथ अपनेपन के भाव को कोई शायद नहीं लिख पाया हो |
बहरहाल वादी में सिमटी हुई जाफरान की खुश्बू अभी भी हिंदुस्तान के दिल तक नहीं पहुँच पाई इसका मलाल हैं मुझे और उन तमाम बुद्धिजीवियों से अपेक्षाएं भी है कि कम से कम वादी को लगी सियासी नज़र का टोटका भी करवा दो ताकि गुलजार हो जाये केशर की क्यारियां |

श्रीनगर का टीआरसी ( टूरिस्ट रिसेप्शन सेंटर ) जहाँ जम्मू जाने वाली टेक्सियों का अम्बार-सा लगा हुआ रहता हैं फिर चाहे समय रात की बारह क्यों ना हो, वही हमारा रुकना हुआ जहाँ से बमुश्किल २०० कदम पर डल गेट है| हम में शामिल हैं मेरा मातृभाषा परिवार जिनमे मेरे साथी अजय जैन ‘विकल्प’ जी और डॉ प्रीति सुराना जी | हाँ मैं से हम हो जाना ही जिंदगी का असली मजा हैं | वादी की वो ठण्डी शाम जो सूरज को विदा करके चांदनी के घर में हमें खींच लाती हैं जहाँ सर्दी से बचने के लिए एक इलेक्ट्रीक कम्बल बिस्तर पर हमारा इंतजार कर रहा होता है और कमरे में लगा रूम हीटर हमें मुहं चिड़ा रहा होता हैं | इन्ही सब के बीच तापमान का अचानक से डिग्री ३ हो जाना भी बहुत याद आता हैं | खैर शाम हुई हमें शाकाहारी भोजन को ढूंढने की जहमत नहीं उठानी पड़ी क्योंकि मेजबान कम दिल अजीज जिनसे पहली मुलाक़ात करने के बाद से ही अपनापन लगने लगा, हाँ नसरीन अली जी ने हमें पहले ही सारे ठिकानों की जानकारी दे दी थी जहाँ शाकाहारी भोजन मिलता हैं | डल गेट जाने के लिए हमने टेक्सी वाले को रोका और इन्दौरी आदतन हमने भाड़े को लेकर थोड़ा-सा मोल-भाव करना चाहा किन्तु उस बुजुर्ग टेक्सी ड्रायवर दद्दू की एक बात दिल के इतने गहरे उतर गई कि उसके बाद हम निशब्द ही हो गए | हाँ उन्होंने कहा कि ‘आप तो मेहमान हैं और मैं आपसे वही दाम लूँगा जो आप दिल से देना चाहेंगे | क्योंकि मेहमान का दिल तोड़ने की कश्मीरी रवायत नहीं ….
इन्ही सब जद्दोहद के बाद रात का तीसरा प्रहर आ जाना जहाँ निंदिया रानी का दुबक कर कहना कि सो जाओं वरना सुबह टैगौर हाल में होने वाले आयोजन के लिए समय से नहीं पहुँच पाओंगे | दिमाग अभी भी वही कसरत कर रहा था कि आखिर विमानतल से टीआरसी तक पहुंचने वाले पुरे रास्तें को हिन्दुस्तानी फ़ौज ने क्यों घेरे रखा हैं ? क्या वाकई कश्मीर को जरुरत हैं इन फौजी लामबंदी की ?
कश्मीर पर सियासत की इतनी गहरी सोच है कि जिसे बर्फ के मानिंद पिगलने की उम्मीद भी करना स्वयं को निश्चल पागलपन में डूबना होगा |
खैर सर्द रात ने ख्यालों की कम्बल ओड़ा कर नींद की आगोश में ले ही लिया और फिर हम सीधे १० बजे सो कर उठे जबकि ११ बजे हमें टैगौर हाल पहुंचना था जहाँ हमारी हिन्दी माँ अपनी बहन उर्दू के घर हमारा इंतजार कर रही थी | बहन के बच्चों का सम्मान जो होना था | हम थोड़ा विलम्ब से पहुंचे लगभग आधा घंटा|

और इसी बीच मेरे अजीज मित्र या कहूँ भाई जिनसे मैं खुद भी पहली दफा मिला बस सोशल मीडिया के सहारे ही तीन सालों से सम्बन्ध और संवाद बना हुआ था, शाह एजाज भाई आ गए …. भाई ने कहा कि आप हमारी एक्टिवा पर चलिए हम आपको कश्मीर दिखाते हैं | और मैं तो चल दिया एक्टिवा पर और मेरे साथी सब टेक्सी से पहुंचे टैगौर हाल |

टैगौर हाल में तमाम कश्मीरी फरिश्तों के बीच ही बैठी थी हिंदी विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो. जोहरा अफजल जी और ख्यात लेखक निदा नवाज जी भी | घाटी में हिन्दी के विकास व विस्तार के लिए कार्यरत संस्था ’वादीज़ हिंदी शिक्षा समिति’ ने ’मातृभाषा उन्नयन संस्थान’ (पंजी.) इंदौर व ’आकाशवाणी केंद्र श्रीनगर’ के साथ मिलकर बुधवार को टैगोर हॉल में हिंदी भाषा सारथियों के सम्मान एवं हस्ताक्षर बदलो अभियान की शुरुआत की थी। बच्चों ने कश्मीरी गीतों पर थिरकते अरमानों के साथ हमारा भी स्वागत किया जिससे है कश्मीर की महक आ रही थी | हाँ वही ‘बुमरो –बुमरो’ |

सांस्कृतिक कार्यक्रम के साथ यह आयोजन प्रारंभ हुआ,जिसमें मुख्य अतिथि कश्मीर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की अध्यक्षा प्रो. ज़ोहरा अफज़ल,रेडियो कश्मीर श्रीनगर के कार्यक्रम प्रमुख सईद हूमायूँ कौसर (स्वागताध्यक्ष) एवं डॉ. निदा नवाज़ (राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित हिन्दी साहित्यकार) विशिष्ट अतिथि रहे। भारतीय जीवन बीमा निगम,जम्मू और काश्मीर बैंक एवं जम्मू कश्मीर पर्यटन विभाग ने इस कार्यक्रम की प्रस्तुति में सहयोग किया। शुरुआत में वादीज़ हिंदी शिक्षा समिति के निदेशक डॉ.अब्दुल अहद बंदरुं ने सभी अतिथियों का स्वागत-सम्मान किया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य बच्चों व आवाम में हिंदी में हस्ताक्षर करने की भावना को जागृत करना, साथ ही साथ उन लेखकों,कवियों एवं विश्वविद्यालयों के शोधार्थियों के मनोबल को बढ़ाना था,जो हिंदी भाषा से जुड़े हैं और हिंदी साहित्य को लेकर अपने उज्जवल भविष्य के सपने देख रहे हैं।

इस मौके पर मातृभाषा संस्थान से मैने हिन्दी की उपयोगिता और उसके कारण ही संस्कृति संरक्षण के महत्व को बताया। साथ ही हिंदी में हस्ताक्षर क्यों हो,इसकी उपयोगिता पर भी प्रकाश डाला | संस्थान के महासचिव अजय जैन ’विकल्प’ ने मातृभाषा.कॉम की शुरुआत से अब तक के प्रकल्प पर विस्तार से चर्चा की। साथ ही संस्थान की उपाध्यक्ष डॉ.प्रीति सुराना ने विद्यालय स्तर से ही बच्चों को हिन्दी से जोड़ने और प्रेरणा को समझाया। कार्यक्रम में स्थानीय मीडिया सहित कई विद्यालयों के छात्र-छात्राएं,लेखक,शायर आदि शामिल हुए। शानदार संचालन की जिम्मेदारी अशफाक लोन ने निभाई। कार्यक्रम में वादीज़ हिंदी शिक्षा समिति की अध्यक्षा नसरीन अली ने सबका आभार माना। और हम सब पहुँच गए ‘कहवा’ पीने | वहीँ कहवा जो अब तक कश्मीरी प्रेम के रूप में हमारे जेहन में जिन्दा हैं | प्रेम से कश्मीर का ताल्लुक तो बहुत ही गहरा हैं इस बात को हमने भी मान लिया क्योंकि कश्मीरी संस्कृति जो मिठास बाँट रही थी उससे तो कभी नहीं लगता की यहाँ भी रक्तरंजित होली खेली गई हैं ?

खैर इसके बाद हम चले डल होते हुए चश्मेशाही, जहाँ चिनार के पत्तों के अभूतपूर्व सौन्दर्य के बीच में पत्थरों से रिसता मीठा पानी भी आता हैं जिसके बारे में कश्मीर कहता हैं कि यह पानी नेहरु जी और इंदिरा जी को रोज पीना होता था जिसके लिए वे अपने निजी विमान से यहाँ का पानी पीने के लिए बुलवाते थे | इसके बाद हम पहुंचे मुग़ल गार्डन जहाँ वादी के सौन्दर्य की झलक डल में बनी देवदार की परछाई की तरह खुद को डूबने पर मजबूर कर रही थी | शाम ढलने लगी और हम वापस अपने ठिकाने की तरफ लौटने लगे जैसे पक्षी दिनभर की मशक्कत के बाद शाम होते ही घरोंदों की तरफ लौट आते हैं|

दिन का ढलना, मतलब कश्मीर में तापमान का गिरना ही होता हैं | यहाँ बस तापमान गिरता हैं इमां नहीं | इस बात को हमने महसूस किया फिर वही शाम को खरीददारी करने डल गेट पहुँचने पर ….

सर्द रात और दिन की थकन अपना काम बखूबी कर रही थी जिसने हमें दुबक कर कम्बल में घुसने को मजबूर कर दिया | और नींद ने आगोश में लेने भी बड़ी फुर्ती दिखाई | जैसे-जैसे रात बड़ने लगी मौसम और सर्द होता जा रहा था | हम तो सो गए क्योंकि सुबह फिर से नए सूरज के पास जाना था | और रेडियो कश्मीर भी | सुबह की थोड़ी-सी धुप ने जल्दी उठा दिया और हम तैयार हो कर निकल पड़े डलगेट की तरफ… क्योंकि हम रात में जाफरान और अखरोट खरीदना भूल गए थे, हम कहवा भी खरीद लाये पर वो मिठास नहीं जो केवल कश्मीर में थी….|

फ़ौज की चेकिंग के बाद नसरीन जी के साथ आकाशवाणी के दफ्तर पहुंचे जहाँ हम हिंदी पूतों का साक्षात्कार होना था, हुआ भी… और फिर हम तैयार हुए अपने मकां की तरफ लौटने को| इन्ही के बीच हमारे मेजबान की आँखों में थमी हुई बरसात का बूंदों के रूप में झलकना देख कर रुक-से गए| खैर जो आया है वो जायेगा ये नियति ने तय कर दिया हैं पर विरह की वेदना से उर भर तो जाता हैं | झलकती आँखों की नमी इस बात की गवाह दे रही थी कि हम जरुर अपने वतन की खुश्बू को समेट कर ले जा रहे हैं| इन्ही सब के बाद पुन: विमानतल की और लौटना जहाँ से अगली यात्रा दिल्ली की थी, इसी के बीच फिर फ़ौज का वो खौफ जो कश्मीर के चेहरे पर साफ तौर पर देखा जा सकता था झलकने लगा | कश्मीर को आदत-सी हो गई है सियासती दर्द की, पर एक बात से फिर इंकार नहीं किया जा सकता कि कश्मीरी वैसे भी नहीं हैं जो हमें रोज पढ़ाए जाते हैं| कश्मीर के कुछ लोगो के कारण आवाम को क्यों सजा? खैर इन सब के बीच हमारे विमान ने भी दिल्ली के लिए उड़ान भर ली और हम समेट लाये वादी से रिसता प्रेम का कहवा | पर यक़ीनन यह कहवा नसरीन जी द्वारा बनवाए गए कहवे जैसा तो नहीं है|

लेखक : अर्पण जैन ‘अविचल ’( पत्रकार एवं स्तंभकार) 

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