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Wednesday, April 25th, 2018 10:02 PM
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फेसबुक डाटा लीक मामला: सियासी मंडी में बिक रही निजता




फेसबुक डाटा लीक मामला: सियासी मंडी में बिक रही निजताAuto & Technology



राजनीति की कार्पोरेट मंडी में अब लोगों की निजता भी बिक रही है। बिक्रेताओं की नजर में इसकी क्या कीमत है, इसका खुलासा फेसबुक डाटा लीक मामले में हुआ है। कहना न होगा कि कार्पोरेट मंडी में इसकी अच्छी खासी कीमत मिल जाती होगी, क्योंकि इससे लोगों की रुझान का पता खरीददारों को शीघ्र ही चल जाता है जिसका वो अपनी रणनीति के मुताबिक मनमाफिक उपयोग कर लेते होंगे। लेकिन अब इस चोखे धंधे में भी मंदी आ जायेगी, क्योंकि फेसबुक के सीईओ जुकरबर्ग सतर्क हो चुके हैं। जल्द ही वह कई ऐसे बदलाव करने वाले हैं जिससे लोगों की निजता बची रह सकेगी। वास्तव में ऐसा होना भी चाहिए।

हाल में ही जुकरबर्ग ने दो टूक कहा कि वह लोगों की जानकारियों की सुरक्षा करने में नाकाम रहने की जिम्मेवारी स्वीकार करते हैं, लेकिन उन्होंने कम्पनी की अगुवाई के लिए एक और मौका दिए जाने की मांग की है। उनकी दलील है कि वह खुद को फेसबुक का नेतृत्व करने के लिए सबसे योग्य समझते हैं। गलतियों से सीखना और उनसे आगे निकलने के रास्ते तलाशना ही जिंदगी है। जब आप फेसबुक जैसी कोई दुनिया के लिए अप्रत्याशित चीज बनाते हैं तो कई काम ऐसे होते हैं जिनमें गड़बड़ होती है। इसलिए निकट भविष्य में फेसबुक में कई अहम बदलाव किए जाएंगे ताकि इस मामले की पुनरावृति दुबारा न हो।

लिहाजा, फेसबुक ने अपने आप में बदलाव लाने के लिए कुछ अहम प्राथमिकताएं निर्धारित की है जो निम्नलिखित है:- पहला, कम्पनी यूजर्स के निजी डेटा पर अधिक नियंत्रण के लिए कड़े कदम उठा रही है और तीसरे पक्ष के एप डेवलपर्स के लिए उपलब्ध व्यक्तिगत डाटा को भी प्रतिबंधित कर रही है। दूसरा, फेसबुक पर प्राइवेसी सेटिंग्स मेन्यू को आसान बनाया जाएगा ताकि यूजर्स प्राइवेसी सेटिंग्स में आसानी से बदलाव कर सकेंगे। इसके लिए फेसबुक में नए प्राइवेसी शॉर्टकट मेन्यू भी बनाए जा रहे हैं। इससे एकाउंट में निजी जानकारियों पर ज्यादा नियंत्रण होगा। तीसरा, यूज़र्स अब समीक्षा कर सकेंगे कि उन्होंने क्या शेयर किया और उसे डिलीट कर सकेंगे। साथ ही यूज़र्स के रियेक्ट, फ्रेंड रिक्वेस्ट, सर्च के बारे में समीक्षा की जा सकेगी। चौथा, यूज़र्स फेसबुक के साथ शेयर डाटा को डाउनलोड भी कर सकेंगे। इससे इस बात की उम्मीद पुनः बंधी है कि लोगों की निजता अक्षुण्ण रहेगी।

दरअसल, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता एलेक्जेंडर कोगान ने एक पर्सनैलिटी एप तैयार किया, जिसके लिए उसने फेसबुक से लगभग तीन करोड़ लोगों का डाटा लिया। फिर उसने यह डाटा कैम्ब्रिज एनालिटिका को दिया। इस मामले में बताया गया है कि उसने जो किया वह कानूनी रूप से गलत नहीं है। फिर भी फेसबुक डाटा लीक मामले में कम्पनी ने अब यह स्पष्ट कर दिया है कि राजनीतिक परामर्श कम्पनी कैम्ब्रिज एनालिटिकल ने पांच करोड़ नहीं बल्कि नौ करोड़ फेसबुक यूजर्स के निजी डेटा का गलत इस्तेमाल किया है जिनमें से सर्वाधिक यूजर्स अमेरिका के हैं।

इस प्रकरण में भारत समेत नौ अन्य देशों के फेसबुक उपयोगकर्ताओं की भी निजी जानकारियां भी लीक हुई हैं, जिसके राजनीतिक दुरुपयोग की आशंकाएं भी बढ़ गई हैं। क्योंकि अमेरिकी और ब्रिटिश मीडिया ने गत माह यह दावा किया था कि ब्रिटिश राजनीतिक परामर्श कम्पनी कैम्ब्रिज एनालिटिका ने पांच करोड़ यूज़र्स के डाटा का अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में गलत इस्तेमाल किया गया था। क्योंकि अमेरिका में 2016 के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंफ ने इस कम्पनी की सेवाएं ली थी। ब्रिटेन के चैनल 4 ने जब कैम्ब्रिज एनालिटिका के कई वरिष्ठ अधिकारियों का स्टिंग ऑपरेशन किया जिसमें उसके सीईओ एलेक्सैंडर निक्स भी शामिल थे तो यह राज खुला कि 2016 में डोनाल्ड ट्रंफ की जीत का श्रेय उन्होंने न केवल लिया था बल्कि यह भी कहा कि लोगों के डाटा का इस्तेमाल कर उन तक गलत जानकारी, घूस और यौनकर्मी महिलाएं तक पहुंचाई गई हैं।

दिलचस्प बात तो यह है कि फेसबुक भी अब इससे नावाकिफ नहीं है। खुद जुकरबर्ग ने बताया कि अमेरिका के अलबामा में पिछले साल हुए विशेष चुनाव में हमने मनमर्जी की सूचना फैलाने वाले ट्रोल को पकड़ने के लिए कुछ नए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल सफलतापूर्वक लागू किए। इस समय हमारे पन्द्रह हजार लोग सुरक्षा और सामग्री समीक्षा पर काम कर रहे हैं और यह संख्या इस साल के आखिर तक बीस हजार से अधिक होगी। क्योंकि अमेरिका के साथ भारत, ब्राज़ील, पाकिस्तान व हंगरी सहित अनेक देशों में होने वाले चुनावों के मद्देनजर हमारे लिए यह साल महत्वपूर्ण है।

यही वजह है कि फेसबुक डाटा लीक मामले के बाद भारत का सियासी माहौल भी गर्म हो चुका है, क्योंकि इस वर्ष जहां कई राज्यों में विधान सभा चुनाव हो रहे हैं या होने वाले हैं, वहीं अगले वर्ष आम चुनाव 2019 भी होना है। लिहाजा, किसी भी राजनैतिक दल के लिए चुनावी नजरिए से यह अहम समय है क्योंकि आम चुनाव 2014 और उसके बाद हुए विधान सभा चुनावों में सोशल मीडिया का कमाल लोग देख चुके हैं और महसूस भी कर रहे हैं।

खास बात यह भी है कि इस मामले में प्रभावित देशों की सूची में अधिकांश वैसे ही देश शामिल हैं जो वैश्विक दुनियादारी में अमेरिका के करीबी देश समझे जाते हैं। क्योंकि अमेरिका के विरोधी खेमें में शुमार रूस-चीन से रणनीतिक रूप से जुड़ा कोई भी देश इसमें शामिल नहीं है। यही वजह है कि इसके राजनैतिक दुरुपयोग की आशंकाएं और भी बढ़ गई हैं। आपको याद होगा कि अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के बाद से ही अमेरिका ऐसे ही विवादास्पद मामले में रूस को कसूरवार ठहरा रहा है, जबकि वह लगातार इससे इनकार करता आया है।

इन बातों से स्पष्ट है कि फेसबुक डाटा लीक मामला सोशल मीडिया के समक्ष किसी गम्भीर चुनौती से कम नहीं है। क्योंकि इससे फेसबुक उपयोगकर्ताओं के निजता के अधिकार का उल्लंघन हुआ है। शुक्र है कि समय रहते ही इसका खुलासा हो गया और लोग सावधान हो गए, अन्यथा कार्पोरेट वार का औजार बन चुके आमलोग कहीं के नहीं रह पाते। सच कहा जाए तो यह सोचा-समझा व्यावसायिक कदाचार है जो हम सबकी डिजिटल सोच के ऊपर किसी करारा तमाचा से कम नहीं है। इससे कार्पोरेट दुनिया की विश्वसनीयता एक बार फिर से तार-तार हुई है।

दो टूक कहें तो इसके नकारात्मक प्रभाव से भारत, अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, आस्ट्रेलिया, वियतनाम, ब्राजील, मेक्सिको, इंडोनेशिया और फिलीपींस के उपयोगकर्ता तो प्रभावित हुए ही हैं, लेकिन खुद फेसबुक भी इससे अछूता नहीं बच पाया है क्योंकि जिस आर्थिक लाभ के लिए परोक्ष रूप से उससे जुड़े लोगों ने बिग डाटा बैंक का सौदा किया, उससे कई गुणा ज्यादा की चपत उसे अब तक लग चुकी है। एक आकलन के मुताबिक गत 17 मार्च को इसका डाटा लीक होने की खुफिया रिपोर्ट के बाद कम्पनी को शेयर बाजार में 100 अरब डॉलर से अधिक का नुकसान हुआ है। यही नहीं, डाटा लीक के खुलासे के बाद फेसबुक के शेयरों में लगभग 18 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।

यही नहीं, कई देशों की सरकार की भौं फेसबुक पर तन गई हैं। जुकरबर्ग एनालिटिका द्वारा यूज़र्स के डाटा का अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में गलत इस्तेमाल किए जाने पर समितियों के समक्ष पूछताछ का सामना करेंगे। वह 10 अप्रैल को अमेरिकी सीनेट की न्यायिक और वाणिज्यिक समिति की संयुक्त सुनवाई में पेश होंगे, वही 11 अप्रैल को अमेरिकी सदन की ऊर्जा, व्यवसाय कमेटी के समक्ष पेश होंगे।

उधर, ऑस्ट्रेलिया में भी कथित निजता उल्लंघन मामलों पर फेसबुक की जांच होगी, क्योंकि कार्यवाहक आयुक्त गोपनीयता एंजेली ने भी कहा है कि जांच में इस बात पर गौर किया जाएगा कि फेसबुक ने निजता कानून का उल्लंघन किया है या नहीं। इधर, भारत सरकार के भी निशाने पर फेसबुक चढ़ ही चुका है। इसलिए इसके रणनीतिकारों के लिए बेहतर यही होगा कि पेशेवर नैतिकता की हिफाजत करें, अन्यथा सोशल मीडिया की प्रासंगिकता भी सवालों के घेरे में खड़ी हो जाएगी। यदि लोगों का भरोसा डिगा तो फिर इससे मुंह फेर लेने में भी उन्हें कोई हिचक नहीं होगी।

लेखक : कमलेश पांडे

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