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Wednesday, June 20th, 2018 11:06 AM
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आंदोलन की राह पर उतरता समाज कितना सही




आंदोलन की राह पर उतरता समाज कितना सहीSocial



किसान आंदोलन हो या चाहे किसी भी अन्य कारणों से आंदोलन करने की बात हो फिर चाहे आरक्षण की बात हो, तनख्वाह बढ़ाने की बात हो या अन्य कोई कारण जिससे समाज वर्ग विशेष को कोई भी समस्या हो बगैर आंदोलन किए सरकार द्वारा आपकी सुनवाई ही नही होगी। या यूं कहें कि सरकार उस समस्या को गंभीरता से नहीं लेती है। कहावत है कि बच्चा नहीं रोए तो मां को भी पता नहीं चलता की बच्चे को भूख लगी है। इसी तर्ज पर सतत इस देश में आंदोलन चला ही करते हैं। निश्चित तौर पर जितना सामूहिक प्रयासों को बल मिलेगा। समस्या उतनी ही गंभीर मानी जाएगी।

समस्या है या नहीं है या कितनी गंभीर है प्रथम दृष्टि में सरकार की समझदारी पर निर्भर करता है कि वह कितनी जल्दी उसको समझ पाती है। अलबत्ता तो किसी भी आंदोलन का होना ही बहुत गंभीर बात होती है। यह सीधे तौर पर सरकार की कमजोरी का ही नतीजा होता है। इतने लोगों को समझा कर, आंदोलन की राह पकड़ना इतना आसान कार्य नहीं है, जब तक की समस्या अति गंभीर नहीं हो किंतु यहां अक्सर सरकार अपने राजनैतिक कलाबाजियों में इतनी व्यस्त रहती है कि उन्हें देशवासियों की तनिक भी चिंता नहीं होती। उनके बारे में तो सिर्फ जुमले ही गढ़े जाते हैं किंतु जब जनता आंदोलन की राह पकड़ती है तब कही सरकार नींद से जागती है। उसमें भी पहले पहल विपक्ष के हाथ की बू आती है।

कोई भी आंदोलन तो समस्या के विकराल से पैदा होता है किंतु उसका जो तरीका अपनाया जाता है वह अक्सर गलत होता है। हड़ताल करना, काम को रोकना, हिंसा पर उतर आना, तोड़-फोड़ करना, दंगे-फसाद करना जैसे कोई भी तरीके सही नहीं कहे जा सकते हैं। इसमें फायदा किसी का भी नहीं हो सकता। न देश का, न समाज का, न सरकार का और न ही आंदोलनकारियों का। एक बारगी जोर-जबरदस्ती से अपनी बात मनवा भी ली जाए तो उसके पीछे जो नुकसान होता है वह बहुत ज़्यादा होता है।

विश्व में जहां तेजी से विकास हो रहा है वही हम इन सब तरीकों में लिप्त हो अपना और अपने विकास का ही नुकसान कर रहे हैं। आम जनता को, विशेष कर आंदोलनकारियों को यह बात समझना चाहिए कि इन तरीकों से जो नुकसान देश को होता है वह किसी न किसी प्रकार हमें ही भुगतना पड़ता है।  फिर वह चाहे सीधे तौर पर हमारा काम का नुकसान हो या सरकारी संपत्ति, कार्य का न होना। देश पर बोझ बढ़ेगा तो वह भी टैक्स के रूप में हम पर ही आएगा। सरकार का कुछ नहीं जाता है। छुरी खरबूजे पर गिरे या खरबूजा छुरी पर कटना तो खरबूजे को ही है।

आंदोलन के सही तरीके अनेक हो सकते हैं

अब बात यह उठती है कि यदि सरकार हमारी बात नहीं सुनती है तब क्या किया जाए। हड़ताल नहीं करना, बंद नहीं करना, दंगा-फसाद नहीं करना तब क्या करें जिससे हमारी आवाज सरकार तक असरदार तरीकों से पहुंच सके। कुछ तरीके हो सकते हैं जो इस प्रकार हैं जो कि कार्य को अच्छे से करते हुए भी किए जा सकते हैं।

-काली पट्टी लगा कर विरोध प्रकट करना।

-प्रस्ताव बना लोगों का समर्थन ले कर सरकार तक पहुंचाना।

– काम के वक़्त के बाद के समय को प्रदर्शन करना, जुलूस निकालना, किसी एक स्थान पर एकत्र हो अपनी बात रखना, ताकत को दिखाना इत्यादि।

अपने कार्य, आम जनता के कार्य को रोके बगैर यदि हम अपना विरोध प्रदर्शन, धरना इत्यादि करते हैं और आम जनता तक अपनी बात पहुंचाकर उनका समर्थन हासिल करते हैं तो वह ज़्यादा असरकारक होता है क्योंकि सरकार को डर तब लगता है जब उसका वोट बैंक खसकता नज़र आता हैं इसका सबसे बड़ी कामयाबी आपको तब मिलती है जब जनता का समर्थन आपको हासिल है जो कि खुशी-खुशी मिलेगा।

अतः इस बात का विशेष ध्यान रखा जाए कि कार्य का, देश की संपत्ति का नुकसान न हो। आम जनता परेशान न हो। सरकारी कार्य भी बाधित न हो। नेता, राजनीति का हो, समाज का हो या किसी अन्य संगठन का यदि वह भड़काऊ भाषण देकर आपको आक्रामक होने के लिए उकसा रहे है तो उनकी नहीं सुने। उनके बहकावे में न आए। बात-मुद्दों से सहमति दो किंतु तरीका अपना अपनाओ। यही आपका व आपके राष्ट्र का विकास है। तभी देश आगे बढ़ेगा। जय हिंद।

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