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Wednesday, August 15th, 2018 09:11 AM
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गुरू नाम की क़ीमत गिरती जा रही है




गुरू नाम की क़ीमत गिरती जा रही है



गुरू नाम सम्मान का सूचक रहा है। उन्हें ईश्वर से भी ऊपर नवाजा गया है। कहते हैं न कि

‘‘गुरू गोविंद दोऊ खड़े
काके लागू पाये
बलिहारी गुरू आपने
गोविंद दियो बताए’’

सत्य भी है। सबके बारे में ज्ञान देने वाला सबसे बड़ा होता है। ‘किंतु’, आज यह किंतु बड़ा ही महत्वपूर्ण हो चला है। इसने ‘गुरू’ शब्द पर ही प्रश्न चिह्न लगा रखे है। इस शब्द की क़ीमत लगातार नीचे की ओर गिरती जा रही है। हमारे ‘गुरू’ कहलाने वाले लोग अब अपनी-अपनी दुकानदारी में लग गए हैं। दुनिया को बदलने वाले स्वयं ही बदल गए हैं। गुरू शब्द तो है किंतु उसकी आत्मा निकल चुकी है।

हमारे तमाम प्रकार के गुरू अलग-अलग विभागों में बंट गए हैं। कोई धर्म की पताका लिए घूम रहा है, तो कोई शिक्षा का व्यापार कर रहा है। धन और भौतिक चमक से समाज को दूर कर संस्कारों को पढ़ाने वाले, स्वयं संस्कारों को छोड़कर धन-वैभव-भौतिक विलास में लिप्त हो चुके हैं। यहां तक कि अपना कैरेक्टर भी लूज कर जनता की भावना का मिसयूज करने लगे हैं। नाम का उल्लेख करने जाए तो कई पन्ने तो नाम में भर जाएंगे और सच कहे तो अब उनके नाम लिखने की भी इच्छा नहीं होती। कहीं अपनी कलम ही गंदी न हो जाए।

गलती इसमें सिर्फ इन लोगों की नहीं है। आम जनता ने भी इनको इतनी अधिक तवज्जो दे दी है, इनको पढ़ने, सुनने, समझने की बजाए इनकी पूजा कर डाली। बस यही पर गुरू शब्द की उलटी गिनती शुरू हो गई। इसमें भी बहुतेरे प्रकार के लोगों ने प्रवेश कर डाला, जिनका मकसद कुछ और ही था। भारत के समाज ने इनका उपभोग किया, उपयोग नहीं।

जहां तक बात वर्तमान शिक्षा क्षेत्र की है तो वह अब व्यापार बन चुकी है। शिक्षा-शिक्षित-समाज-देश उत्थान से उनका कोई लेना देना नहीं है। वे महज विषयागत ज्ञान देकर अपने कर्तव्यों की इति श्री कर लेते हैं। छात्रों और छात्रों के भविष्य से उनका कोई लेना देना नहीं होता। बस स्वयं का वेतन, स्वयं की आय ही उनके लिए सब कुछ होता है। यह अब व्यापार से अधिक कुछ नहीं बचा हैं युवा डिग्रियां तो पा लेते हैं किंतु उसके आगे की कहानी बड़ी भयावह हो जाती है। कई तो इतने डिप्रेशन में चले जाते है। कि ‘आत्महत्या’ तक का कदम उठा लेते हैं। फिर भी यह वर्ग मूक-दर्शक बन अपनी आय तक सीमित है। अब आप ही सोचें कि इनके लिए श्रद्धा कहां से लाए।

गुरू पूर्णिमा के मौके पर हम ईश्वर से यही प्रार्थना करते हैं कि इन्हें इस बात की सद्बुद्धि दे और इन्हें ऐसा ज्ञान दे कि ये पुनः राष्ट्र-समाज उत्थान के लिए तैयार हो सके।

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