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Monday, July 23rd, 2018 12:13 AM
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नौकरी की आस में भटकता डिग्रीधारी युवा




नौकरी की आस में भटकता डिग्रीधारी युवा



‘कैरियर यानि नौकरी’ यह बात इस देश के युवाओं में बचपन से ही कूट-कूट कर भर दी गई है। बड़ी-बड़ी कंपनियों में आर्कषक सेलेरी पर नौकरी हर एक युवा का सपना बन चला है और क्यों न हो जब घर-परिवार, समाज, संबंधों में लड़कियों की च्वाईस, शिक्षक, सरकार सभी इसी दिशा में कार्य कर रहे हैं। हर एक राजनैतिक पार्टियों के लिए यह एक असंभव सा चैलेंज है किंतु सभी ‘वोटरों’ को रिझाने के लिए यह जुमले कहते रहते हैं कि हम सत्ता में आए तो इतनी करोड़ नौकरियां पैदा कर देंगे जबकि यह उन्हें मालूम है कि वे सब कुछ ऐसा नहीं कर सकते। बस जुमला भर कहना है और सत्ता को हथियाना उनका काम है। न इस देश के युवाओं से न उनके रोजगार से उनका कोई मतलब होता है, उन्हें पता है कैरियर के लिए भटकता युवा कुछ न कुछ तो कर ही लेगा और कोई यदि कुछ न कर पाया तो आत्हमत्या कर लेगा। सब झंझट खत्म।

डिग्री थामे युवाओं को पकौडे की सीख मिली

पिछले दिनों प्रधानमंत्री, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और भी कई मंत्री यह कहते रहे कि युवाओं को नौकरी के लिए भटकने के बजाए पकौड़े तलने का कार्य कर लेना चाहिए। बिल्कुल सही कहा सभी ने, सरकार तो नाक़ाबिल हो कुछ कर नहीं सकी, इस जिम्मेदारी से अपने घुटने टेक चुकी है। न नौकरियां पैदा कर पाई और न ही उन्हें व्यापार के लिए कोई रास्ता दे पाई। उल्टा संपूर्ण देश में व्यापार के खिलाफ नीतियां बना कर जो चल रहा था उसे भी ठप्प कर दिया। सभी व्यापारियों को चोर बना दिया। भ्रष्टाचारी-लाल फिताशाही अफसरों के चंगुल में फंसा दिया। अब वे सब भी न स्वंय का व्यापार बचा पाए और न ही नौकरियां पैदा कर पाए। उपर से देश की जिम्मेदारी लेने वाली सरकार ने युवाओं को डिग्रीयां थमा पकौडे़ तलने का संदेश दे डाला यानि जले पर नमक छिड़क डाला। सिर्फ चंद बड़ी कंपनियों के हाथ देश का संपूर्ण व्यापार सौंप देना, उनके विकास को जीडीपी में देश की विकास दर बताकर इतराना। समझना कि देश विकास कर रहा है। ये कोई आत्ममुग्ध सरकार ही कर सकती है। जिसका देश और देशवासियों से कोई लेना-देना नहीं है।
हर साल 1.25 करोड़ नौकरियां देने का वादा करने वाली सरकार जब कुछ लाख नौकरियां ही नहीं दे पाई तो वह क्या कर सकती है। अब वह ‘खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे’ की तर्ज पर युवाओं के जज्बातों से खेलने लगी है और तो और जब इसके खिलाफ आवाज उठाई जाती है तो उन्हें वे देशद्रोही होने का तमगा दे देती है जबकि देशद्रोही कौन है यहां स्पष्ट हो जाता है।

परिवार और समाज ने भी कम खिलवाड़ नहीं किया युवाओं के साथ

युवाओं के साथ सिर्फ सरकार ही ऐसा कर रही है ऐसा नहीं है बल्कि हमारे समाज में, परिवार में भी युवाओं के कैरियर के प्रति सोच भी ठीक नहीं है। जो उन पर एक बोझ के रूप में बढ़ती जा रही है। ‘कैरियर’ मतलब एक अच्छी सी बड़े पैकेज वाली नौकरी तभी मिलती है उसको छोकरी। परिवार में, समाज में शुरू से ही इस बात पर फोकस रहता है। तभी से उन पर अत्यधिक प्रेशर रहता है क्योंकि उनकी क़ीमत तभी है जब उनके पास बड़े पैकेज की अच्छी सी नौकरी हो। अन्यथा वो यू ही है बस। उसके बगैर उसकी कोई क़ीमत नहीं है। आज इसी सोच ने एक विकराल रूप धर लिया है। युवा साथी उनके बोझ तले दबते चले आ रहे हैं। पढ़ाई कर डिग्री तो जैसे तैसे पा लेते हैं किंतु जॉब नहीं मिलती।

शिक्षा तंत्र भी कर्तव्य पूरा कर बस डिग्री बांटने का कार्य कर रहा है।

जब युवा साथी परिवार और समाज की सोच से आगे शिक्षा की ओर बढ़ता है तो समस्या गंभीर होती चली जाती है क्योंकि शिक्षा देने वाले ‘सो कॉल्ड गुरू’ भी उन्हीं की सोच के चलते नौकरी का टारगेट देकर डिग्रीयां थमा देते हैं। बात यहां गंभीर इसलिए भी हेती है क्योंकि अलबत्ता एक तो वे स्वयं शिक्षाविद है। सही ज्ञान को देना, दिशा देना उनका कर्तव्य है किंतु कैसे भी करके उनके डिग्रीयां थमाने का कार्य भर वे करते हैं। क्या शिक्षा दी जा रही है? वह उनके काम की है या नहीं? उस शिक्षा को पाने के बाद वे उस काबिल होंगे या नहीं की वे अपनी ज़िन्दगी में धनोपार्जन का कार्य कर सकें? सिर्फ नौकरी ही नहीं बल्कि स्वंय के रोजगार, स्वयं के हुनर से भी वे अपना कार्य कर सकें, इस बात की व्यवस्था कर सकें। समाज में एक उत्कृष्ट मानव का सृजन हो सके। सभी को अपने हुनर के अनुरूप कार्य मिल सके, इन सभी बातों की जिम्मेदारी शिक्षक की होना चाहिए। बस डिग्रीभर थमा देना उनका कार्य नहीं है।

अंत में युवा साथियों से ही उम्मीद भर बाकि है कि वे ही स्वयं उठ खड़े हो और अपने लिए काम का सृजन करें क्योंकि आने वाला कल आप ही हैं। कल का परिवार, समाज, सरकार सभी कुछ आप ही है। अब जो हो चुका वो हो चुका। आज को संभालें और आने वाला कल अच्छा बना दें ताकि जो तकलीफ आज उनको हो रही है वो कल उनके बच्चों को उनके परिवारों को ना। जय हिंद।

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