page level


Thursday, May 24th, 2018 06:38 PM
Flash

कसौली अवैध निर्माण: कानून के शासन पर सवालिया निशान?




कसौली अवैध निर्माण: कानून के शासन पर सवालिया निशान?Social



कमलेश पांडे. देश-प्रदेश में अवैध निर्माण होना कोई नई बात नहीं है, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के ताजा रुख से यह साफ हो चुका है कि ऐसा कोई भी खेल अब बहुत ज्यादा दिनों तक नहीं चलेगा, बशर्ते कि कोई ऐसे सुलगते मसलों पर सर्वोच्च न्यायालय का ध्यान आकृष्ट कराए। एक संवेदनशील मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने दो टूक कहा कि “ये सोच नहीं चलेगी कि अवैध निर्माण करो, बाद में कोर्ट में देखेंगे और अगर तोड़फोड़ होगी तो गोली मार देंगे।”

याद दिला दें कि हाल में ही हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले के कसौली में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर चलाए गए अवैध निर्माण विरोधी अभियान के दौरान एक सिरफिरे होटल व्यवसायी और नारायणी गेस्ट हाउस के मालिक उदय सिंह ने एक कर्तव्यनिष्ठ सहायक नगर नियोजन अधिकारी शैलबाला शर्मा की गोली मारकर हत्या कर दी और जंगल की राह पकड़कर चलते बना। शुक्र है कि पुलिस की कड़ी मशक्कत के बाद वह गिरफ्तार कर लिया गया। इस मामले ने पूरी व्यवस्था के ऊपर एक और सवालिया निशान लगा दिए हैं?

दरअसल, इसी मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने जो तल्ख टिप्पणी की है, वह प्रशासन के लिए अत्यंत शर्मिंदगी की बात है। क्योंकि अदालत ने साफ कहा कि “जो लोग कानून का पालन करते हैं वे दुखी हैं और जो कानून तोड़ते हैं उनको प्रोत्साहित किया जाता है। इसलिए ‘कानून का शासन’ लागू किया जाना चाहिए, ना कि कानून तोड़ने वालों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।”

सर्वोच्च न्यायालय की यह टिप्पणी उस वक्त आई है जब केंद्र से लेकर राज्य तक में बीजेपी के नेतृत्व वाली कथित ईमानदार सरकारों का बोलबाला है। केंद्र में मोदी सरकार और राज्य में जयराम ठाकुर की सरकार है। दोनों सरकारें बीजेपी की ईमानदार सरकार करार दी जा रही हैं। लेकिन कोर्ट को उक्त हत्याकांड पर टिप्पणी करते हुए यह कहना पड़ा कि “महिला अफसर की हत्या कोर्ट के आदेश की वजह से नहीं हुई है, बल्कि कानून को लागू ना करने पर हुई है। पूरे राज्य में अवैध निर्माण हुए हैं, लेकिन सरकार क्या कर रही है।”

देखा जाए तो कोर्ट इस बात से भी अनभिज्ञ नहीं है कि पांच साल पहले मनाली में वीडियोग्राफी हुई थी, लेकिन फिर भी गैर कानूनी निर्माण होते रहे। लिहाजा समझा जा सकता है कि देश की मौजूदा सरकारें किस तरह की प्रशासनिक अराजकता को।बढ़ावा दे रही हैं और क्यों दे रही हैं? निःसन्देह, यह समझना आसान है भी और नहीं भी।

इस बात में कोई दो राय नहीं कि कार्यपालिका में जो लापरवाही व्याप्त है वह अनायास नहीं बल्कि रणनीतिक है। क्योंकि परोक्ष रूप से इस पर अंकुश रखने वाली विधायिका ही सियासी भ्रष्टाचार की वजह से इतनी अभिशप्त हो चुकी है कि कानून का शासन अब हर किसी को बेमानी प्रतीत रहा है। इसलिए न्यायालय की यह टिप्पणी देश-काल-पात्र के सापेक्ष है। यदि कोर्ट सख्त होता है तो राजनेताओं, पूंजीपतियों, अधिकारियों और सार्वजनिक जीवन जीने वाले कतिपय लोगों की पारस्परिक मिलीभगत से सही को गलत और गलत को सही बनाने या फिर रणनीतिक खामोशी बरतने का जो खेल चल रहा है, उस पर निश्चित तौर पर रोक लगेगी।

प्रथमदृष्टया, यह कांड अपने पीछे कई रहस्यों को समेटे हुए है जिसका उजागर होना बहुत जरूरी है। क्योंकि यदि ऐसा नहीं किया गया तो उस कर्तव्यनिष्ठ महिला अधिकारी की शहादत व्यर्थ चली जाएगी। हालांकि इस घटना के बाद से सम्बन्धित पक्षों में जितनी बेचैनी दिखाई दी है, उस पर यदि ईमानदारी पूर्वक अमल किया गया तो ऐसी घटनाओं को भविष्य में रोका जा सकता है।

वास्तव में, यह हत्याकांड न केवल प्रशासन बल्कि न्यायपालिका के मुंह पर भी एक करारा तमाचा है। क्योंकि जिस तरह से होटलों के अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई करने के दौरान यह घटना घटी है, वह भले ही देखने में बहुत छोटी है लेकिन इसके पीछे एक बड़ा सन्देश छिपा हुआ है जिसे समझने और उसका हल ढूंढने की जरूरत है। सन्देश यह कि कुछेक लोगों का अब इस सिस्टम से भरोसा उठता जा रहा है और इसके चक्कर में फंसकर खुद के बर्बाद होने से पहले वो सामने वाले को भी बर्बाद करने पर तुल जाते हैं, चाहे किसी की हत्या ही क्यों नहीं करनी पड़े! और फिर जेल की त्रासदी समझने के बावजूद।

बेशक, अतिक्रमण और अवैध निर्माण देशव्यापी समस्या है। इसके लिए अतिक्रमणकारी और स्थानीय प्रशासन दोनों समान रूप से जिम्मेवार हैं। यही वजह है कि इनकी आंखमिचौली भी परस्पर चलती रहती है जिसे प्रायः ले-देकर निपटा भी दिया जाता है। लेकिन इनके बीच जब किसी तीसरे पक्ष की दाल नहीं गलती या फिर आपस में अनबन हो जाती है तो कोई न कोई पक्ष इन जटिल मसलों को लेकर न्यायालय पहुंच जाता है। और जब वहां से दो टूक कानूनी फैसला सुनाया जाता है तथा समयबद्ध अनुपालन की लक्ष्मण रेखा खींच दी जाती है तो प्रशासन की कम लेकिन अतिक्रमणकारियों के हाथ-पांव ज्यादा फूलने लगते हैं।

लेकिन कोर्ट की अवमानना से बचने के लिए तब अधिकारी बेहद सख्त हो जाते हैं। यही वजह है कि अतिक्रमण विरोधी अभियान चले और हो-हल्ला, हंगामा, नारेबाजी, धरना-प्रदर्शन आदि न हो, प्रायः ऐसा नहीं होता। कभी कभी तो मारपीट, रोड़ेबाजी और आगजनी की भी नौबत आ जाती है। इसलिए किसी भी ऐसे अभियान के दौरान पुलिस के पर्याप्त प्रबन्ध किए जाते हैं। ऐसी किसी भी कार्रवाई के दौरान या फिर उसके बाद लोग सवाल भी उठाते हैं कि आखिरकार ऐसी कोई भी कार्रवाई टुकड़े-टुकड़े में ही क्यों की जाती है? क्यों नहीं एक ही बार में पूरे देश अथवा राज्य विशेष में ऐसे अभियान चलाए जाते है?

आप अंदाजा लगा सकते हैं कि इस अवैध निर्माण विरोधी अभियान से हत्यारोपी कितना क्षुब्ध रहा होगा कि उसने एक अधिकारी को गोलियों से भून दिया और दूसरे अधिकारी को घायल कर दिया। इसलिए दिनदहाड़े हुई इस वारदात से समझा जा सकता है कि देश में विधि-व्यवस्था की स्थिति कितनी गम्भीर है और कभी कथित छूट और कभी सख्ती से परेशान लोग किस हद तक दुस्साहसी बनते जा रहे हैं!

सीधा सवाल है कि पुलिस ने हत्यारे को तुरन्त क्यों नहीं पकड़ा? आख़िरकार वह कैसे भाग गया और पकड़े जाने से पहले उसने कहां-कहां शरण ली? शहीद महिला अधिकारी को पर्याप्त सुरक्षा क्यों नहीं मुहैया करवाया गया? क्या कुछ लोग बिल्कुल निरंकुश हो गए हैं जिनमें कानून और कोर्ट के आदेश का जरा भी सम्मान नहीं है? गम्भीर सवाल है कि अगर ऐसे लोगों को मारा जाएगा तो क्या कोर्ट को ऐसे आदेश देने बन्द कर देने चाहिए! क्या ये कृत्य न्यायालय की अवमानना और न्यायालय को चुनौती देने के समान नहीं है?

बहरहाल, इस मसले पर भी पक्ष-विपक्ष की राजनीति शुरू हो गई है। जहां एक ओर कांग्रेस के हिमाचल प्रदेश के अध्यक्ष सुखविंदर सिंह सुखू ने इस घटना के विरोध में धरना-प्रदर्शन किया और बिगड़ती कानून-व्यवस्था को लेकर प्रदेश सरकार के खिलाफ नारेबाजी की। वहीं दूसरी ओर इस घटना के बाद अपनी सरकार की छवि को लेकर सतर्क हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने स्पष्ट एलान कर दिया कि ऐसी घटनाएं बर्दाश्त नहीं की जाएंगी और राज्य में कानून-व्यवस्था को हर हाल में बरकरार रखा जाएगा और सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का पालन होगा।

गौरतलब है कि कसौली के जिन 13 होटलों में हुए अवैध निर्माण के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है उनको संवेदनशील पर्वतीय स्थान होने के चलते दो मंजिल तक निर्माण की ही इजाजत मिली थी, लेकिन कुछ ने तो छह मंजिल तक निर्माण कर लिया था, जिसे ढहाने का मूल आदेश नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का था जिसे होटल मालिकों ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। लेकिन वो लोग तब भौचक्के रह गए जब सर्वोच्च न्यायालय ने न केवल एनजीटी के आदेश को बरकरार रखा बल्कि दो टूक कहा कि होटल व्यवसाय के नाम पर आम लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ करने की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि ये होटल उस जगह पर बने हुए हैं, जहां भूस्खलन का खतरा है।

लिहाजा, सुलगता हुआ सवाल यह है कि क्या उन अधिकारियों पर भी कोई कार्रवाई होगी जिनकी अनदेखी की वजह से ऐसे मामले न केवल तूल पकड़ते हैं, बल्कि कभी कभी किसी के लिए जानलेवा भी बन जाते हैं? क्या यह प्रवृत्ति कानून के शासन पर सवालिया निशान नहीं है? यदि है तो जो लोग जिम्मेवार हैं उनके खिलाफ देशव्यापी कार्रवाई कबतक होगी?

यह भी पढ़ें :

जापानी बस ड्राइवरों ने की ऐसी हड़ताल जो भारत में कभी नहीं हुई

आज शाम फिर इन 5 राज्यों से टकराएगा तूफान, जानिए क्यों आता है “आंधी-तूफान”

3.3 सेकेंड्स में 100km की रफ्तार पकड़ लेती है ये CAR, कीमत जान चौक जाओंगे

Sponsored