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Wednesday, June 20th, 2018 12:19 AM
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आखिर क्यों ईजाद नहीं किए गए निपाह वायरस के टीके?




आखिर क्यों ईजाद नहीं किए गए निपाह वायरस के टीके?Health & Food



कमलेश पांडे. निपाह वायरस और चिकित्सा विज्ञान में आंखमिचौली जारी है।फिर भी रहस्यमय और बेहद घातक ‘निपाह’ वायरस से निपटने में भारत सरकार और विश्व स्वास्थ्य संगठन की जो नीतिगत और रणनीतिक खामियां सामने आई हैं, वह इनकी विफलता की चुगली कर रही हैं। ऐसा इसलिए कि विगत दो दशकों में तीसरी बार इस जानलेवा वायरस ने आमलोगों पर कहर बरपाया, जिसमें वक्त-वक्त पर तकरीबन पांच दर्जन लोगों की असमय मौत हो गई। लेकिन हैरत की बात है कि ये लोग टुकुर-टुकुर ताकने के सिवाय कुछ भी नहीं कर पाए। देखा जाए तो इस दुर्लभ वायरस के संक्रमण से निबटने में पहले पश्चिम बंगाल सरकार और अब केरल सरकार की जो नाकामी सामने आई है, वह उनकी मानवीय असंवेदनशीलता का परिचायक नहीं, तो फिर क्या है?

सुलगता हुआ सवाल है कि केंद्र सरकार, डब्ल्यूएचओ और दोनों राज्य सरकारों के द्वारा विगत दो दशकों में भी इस जानलेवा निपाह वायरस से निबटने के लिए एक कारगर टीके तक का ईजाद नहीं किया गया! जबकि लम्बी चौड़ी बातें होती रहीं। आखिर ऐसा क्यों, कबतक और किसके लिए? क्या यह उनकी रणनीति और संचालन तंत्र में किसी बड़ी कमी का संकेत नहीं है जिसके चलते ऐसी बिडम्बनापूर्ण और निराशाजनक स्थिति आमलोगों को झेलनी पड़ी है और सरकारें सिर्फ खानापूर्ति करके अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेती हैं।

इससे स्पष्ट है कि अपनी उपलब्धियों का अनावश्यक ढिंढोरा पीटने वाले 21वीं सदी के चिकित्सा विज्ञानियों ने या तो इस जानलेवा वायरस से निपटने को चुनौती के रूप में नहीं लिया, या फिर इस हेतु अपेक्षित बजट, शोध योग्यता और उसके लिए जरूरी उपकरणों, संसाधनों की किल्लत है जिस पर गौर करने में हमारा प्रशासनिक और राजनीतिक नेतृत्व सर्वथा विफल रहा है।

बता दें कि गत एक पखवारे में केरल के कोझिकोड जिले में ‘निपाह’ वायरस की चपेट में आकर जिस तरह से 13 लोगों की मौत हो गई और 2 अन्य लोगों की हालत नाजुक बनी हुई है, वह राज्य ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय चिंता का विषय है। इस खतरनाक वायरस से पीड़ित लगभग दो दर्जन मरीजों को चिकित्सकीय निगरानी में रखा गया है ताकि स्थिति स्पष्ट हो सके और उन्हें समुचित चिकित्सा मिल सके। इस दुर्लभ वायरस से जुड़ी अतिरिक्त जानकारियां हासिल करने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य विभाग ने भी प्रभावित जिले में अपनी एक टीम भेजी है जो जरूरी जानकारियां एकत्रित करके आगे की रणनीति तय करेगी।

चिकित्सा की दुनिया में निपाह वायरस को एनअाईवी इंफेक्शन भी कहा जाता है जिसके अहम लक्षणों में सांस लेने में तकलीफ, तेज बुखार, सिरदर्द, जलन, चक्कर आना, भटकाव और बेहोशी आदि शामिल है। इसलिए इस इंफेक्शन से पीड़ित मरीज को अगर तुरंत इलाज नहीं मिले तो दो दिन के भीतर वह कोमा में जा सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी मानता है कि इस जानलेवा वायरस से लड़ने के लिए उसके द्वारा अब तक कोई टीका (वैक्सीन) विकसित नहीं किया गया है, इसलिए इस प्राणघातक वायरस से पीड़ित मरीजों को इंटेसिव सपॉर्टिव केयर में रखकर ही इलाज किया जा सकता है।

चिकित्सा विज्ञानियों के मुताबिक, यह खतरनाक वायरस बढ़ी तेजी से फैलता है और ज्यादातर मामलों में जानलेवा साबित होता है। क्योंकि एक खास तरह का चमगादड़ जिसे फ्रूट बैट कहते हैं, जो फल के रस का सेवन करता है, वही निपाह वायरस का मुख्य वाहक है। इसके अलावा, यह दुर्लभ एवं खतरनाक वायरस संक्रमित सूअर, चमगादड़ से भी इंसानों में फैलता है। यही नहीं, एनअाईवी संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने से भी यह वायरस तेजी से फैलता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 1998 में मलयेशिया के काम्पुंग सुंगई में पहली बार एनअाईवी संक्रमण का पता चला था। तब यह बीमारी संक्रमित सूअरों की चपेट में आने की वजह से किसानों में फैली थी। लेकिन इसके बाद जहां-जहां एनआईवी के बारे में पता चला, इस वायरस को लाने-ले जाने वाले कोई माध्यम नहीं थे। हालांकि वर्ष 2004 में बांग्लादेश में कुछ लोग इस वायरस की चपेट में आए। उनलोगों ने खजूर के पेड़ से निकलने वाले तरल को चखा था और इस तरल तक वायरस को लेने जानी वाली चमगादड़ थीं, जिन्हें फ्रूट बैट कहा जाता है।

सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के मुताबिक, निपाह वायरस का इंफ़ेक्शन एंसेफ़्लाइटिस से जुड़ा है, जिसमें दिमाग़ को नुक़सान होता है। ये वायरस तीन से 14 दिन तक तेज़ बुख़ार और सिरदर्द की वजह बनता है। साल 1998-99 में जब ये बीमारी फैली थी तो इस वायरस की चपेट में लगभग 265 लोग आए थे जो अस्पतालों में भर्ती हुए। इनमें से क़रीब चालीस प्रतिशत मरीज़ ऐसे थे जिन्हें गंभीर नर्वस बीमारी हुई थी और ये बच नहीं पाए थे।

जहां तक जानलेवा निपाह वायरस के भारत में मौजूदगी का सवाल है तो उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2001 में पहलीबार और सन 2007 में दूसरी बार इसकी संक्रामकता पश्चिम बंगाल में दिखाई पड़ी। तब इस राज्य में दुर्लभ निपाह वायरस के 71 मामले सामने आए थे जिसमें 50 लोगों की असमय मौत हो गई थी। दोनों ही बार इस बीमारी के ज्यादातर केस पश्चिम बंगाल के उन इलाकों में पाए गए जो बांग्लादेश से सटे हुए थे।

अलबत्ता, निपाह को लेकर एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। अब जांच में यह बात सामने आई है कि निपाह वायरस का मुख्य कारण चमगादर नहीं, बल्कि कुछ और भी है। क्योंकि स्वास्थ्य महकमें के अधिकारियों ने केरल के कोझिकोड और मल्लपुरम में 13 जिंदगियां छीनने वाले निपाह वायरस के फैलने के पीछे चमगादड़ के होने की बात से इनकार कर दिया है।

देखा जाए तो केरल से शुरू हुए निपाह वायरस का खौफ अब पूरे भारत में है। लिहाजा, दिल्ली-एनसीआर के लोगों को भी अलर्ट कर दिया गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी निपाह को एक उभरती बीमारी करार दिया है। ये वायरस केला, खजूर और आम जैसे फलों में भी हो सकता है। इसलिए भूलकर भी इन्हें न खाएं या फिर अच्छे से धोकर खाएं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से पूरे देश में चेतावनी दी जा रही है कि गंदे जानवरों के संपर्क से दूर रहें। बहरहाल, भारत में इस तरह के वायरस को पता करने की अतिआधुनिक सुविधाएं हैं, लेकिन सटीक जानकारी नहीं मिल पाती है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने भी इस संबंध में एक कमेटी गठित की है जो बीमारी की तह तक जाने में जुटी है। एहतियात के तौर पर सभी हवाई अड्डों पर अर्लट जारी किया गया है ताकि जितने भी विदेशी महेमान आएं, उनकी स्वास्थ्य जांच की जा सके।

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