Monday, November 20th, 2017 09:21 AM
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छात्रों की समस्याओं का समाधान कहां और किसके पास?




छात्रों की समस्याओं का समाधान कहां और किसके पास?Education & Career

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‘शिक्षा’ आज हमारी ज़िन्दगी का एक अहम पहलू है। इसके बिना एक अच्छी ज़िन्दगी की कल्पना नहीं की जा सकती। शिक्षा को हम ही नहीं हमारे आसपास के लोग भी काफी महत्व देते हैं क्योंकि माना जाता है कि शिक्षा ही वो साधन है जिसकी मदद से एक इंसान एक अच्छी ज़िन्दगी पा सकता है लेकिन क्या ऐसा सच में होता है कि एक बहुत पड़ लिखा इंसान एक अच्छी ज़िन्दगी जी रहा है क्योंकि आज हालात ये है कि कॉलेज पड़ा हुआ स्टूडेंट भी पांच से दस हजार की नौकरी कर रहा है और एक बिना पड़ा लिखा इंसान उससे भी ज़्यादा कमा रहा है तो फिर ऐसे में हमारे लिए शिक्षा के क्या मायने रह जाते हैं।

पूरे देश में आज ये हाहाकार होती है कि नौकरी नहीं, बेरोजगारी बढ़ रही है, कम पैसों में काम करना पड़ रहा है। इन सभी का कारण कहीं न कहीं हमारी एजुकेशन और उसमें छुपी समस्याओं में ही छुपा हुआ है क्योंकि हमारी नौकरी की नींव स्कूल और हमारे घर से डलती है। यही वो दो जगह है जहां पर हमारे जीवन की, हमारे करियर की शुरूआत होगी। यहां हम जैसा सीखेंगे वही हमारी आगे की ज़िन्दगी में करेंगे अगर यहीं से हमें सही शिक्षा नहीं मिलेगी तो आगे कैसे चलेगा। बस इन्हीं दो जगहों पर कुछ ऐसी समस्याएं व्याप्त है जिनकी वजह से देश में भ्रष्टाचार और बेरोजगारी जैसी समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। आइए आपको बताते हैं क्या है वो समस्याएं

1. सिर्फ विषयागत ज्ञान

आजकल हर बच्चा स्कूल जाता है कॉलेज जाता है और पढ़कर घर को आ जाता है। उसने क्या पड़ा। ये सिर्फ उसकी नोटबुक के अलावा कोई नहीं जानता। टीचर्स भी सिर्फ पढ़ाते हैं। दरअसल स्कूलों में भी टीचर्स पर सिलेबस को पूरा कराने का बोझ होता है ऐसे में टीचर्स बच्चों को सिर्फ विषयागत ज्ञान ही दे पाते हैं। कभी उसे ये नहीं बता पाते कि उस पढ़ाई हुई चीज़ को अपनी ज़िन्दगी में उपयोग कैसे करना है। इसी कारण आज हमारे देश में बेरोजगारी जैसी समस्याएं उत्पन्न हो रही है जिनका दोष हम सरकार पर मढ़ देते हैं।

आज के समय में कई कॉलेज की स्थिति भी ऐसी बनी हुई है जिनसे पास हुए स्टूडेंट नौकरी के लायक ही नहीं रहते। दरअसल कॉलेज में भी विषयागत ज्ञान की तरफ ज़्यादा ध्यान दिया जाता है। बात अगर इंजीनियरिंग की करें तो कई कॉलेजों में सिर्फ किताबों से पढ़ाया जाता है प्रैक्टिकल नॉलेज बमुश्किल ही दिया जाता है इसलिए जब वो जॉब या इंटरव्यू देने जाते हैं तो रिजेक्ट हो जाते हैं क्योंकि कोई भी किसी को अगर हायर करेगा तो वो चाहेगा कि उसे कम से कम कुछ काम तो आता हो।

इस समस्या से बचने के लिए स्टूडेंट और टीचर्स दोनों को ही पहल करना पड़ेगी। सच कहें तो इसमें टीचर्स को सबसे ज़्यादा भूमिका निभानी पड़ेगी। टीचर्स सिर्फ विषयागत ज्ञान ही न दें बल्कि उन्हें व्यावहारिक ज्ञान भी दें। टीचर्स स्टूडेंट को पढ़ाने के साथ ये भी समझाएं कि जो उन्होंने पढ़ाया है वो उनकी लाइफ में कैसे यूज होगा। तभी स्टूडेंट उस पढ़ाए हुए टॉपिक से और अच्छे से जुड़ पाएंगे।

2. बच्चों के भविष्य से कोई लेना-देना नहीं

स्कूलों और कॉलेज में कम ही टीचर्स होते हैं जो बच्चों से पर्सनली अटैच होते हैं और उन्हें करियर में क्या करना चाहिए इस पर सही राय देते है। अधिकतर टीचर्स को सिर्फ अपना सिलेबस पूरा कराने की जल्दी होती है। उन्हें कभी स्टूडेंट के भविष्य से कोई लेना-देना नहीं होता है। दरअसल टीचर्स ही होते हैं जिनसे बच्चा अपने पैरेंट्स से भी ज़्यादा अटैच होता है ऐसे में अगर वो ही उसे सही गाइडेंस नहीं करेंगे तो उसका भविष्य क्या होगा। टीचर्स और प्रोफेसर को चाहिए कि वो बच्चों को उनके भविष्य को लेकर गाइड करें। उन्हें बताए कि यहां से निकलकर आगे किस तरह का कॉम्पीटिशन है। इसके साथ ही उन्हें व्यावारिक ज्ञान भी दें जो उनकी निजी ज़िन्दगी में काम आए।

3. ज्ञान तो दिया लेकिन कैसे उपयोग होगा ये नहीं सिखाया

आजकल स्कूलों में जैसा पढ़ाया जाता है ये ठीक उसी तरह है जैसे किसी निशानेबाज को बंदूक चलाने की ट्रेनिंग तो दे दी लेकिन ये नहीं बताया कि उसे वो बंदूक किस पर चलाना है और किस पर नहीं। आज हमारे एजुकेशन सिस्टम की ये सबसे बड़ी समस्या है जिसे दूसर करने के लिए उन्हें जिस चीज़ को पढ़ाया जा रहा है उसके साथ ये भी बताया जाए कि आप इसे कैसे यूज करें, कहां यूज करें, इसका सदुपयोग कैसे करें। जिससे बच्चा संपूर्ण स्तर पर विकसित हो सके। नही तो आने वाले समय में हाल ये होगा कि बच्चा ‘अ’ अनार का सिर्फ किताब में ही पहचान पाएगा। रियल लाइफ में नहीं।

4. टीचर्स का अपनी ही समस्याओं पर फोकस करना

कई जगहों पर देखा गया है कि टीचर्स अपनी ही समस्याओं में डूबे रहते हैं और बच्चों की सुनते नहीं जबकि उन्हें बच्चों की समस्याओं का भी समाधान करना चाहिए। स्कूलों में बच्चों की उम्र ऐसी होती है जिसमें उन्हें दुनिया की कई सारी चीज़ें जानने की जिज्ञासा रहती है बच्चा पूछता भी है लेकिन कई टीचर्स उसे ये कह देते हैं कि ये उसके सिलेबस में नहीं है। बस यहीं से उसकी सोच खत्म हो जाती है और वो दुनियादारी की चीज़ों पर बात करना छोड़ देता है।

ऐसी कई सारी समस्याएं हमारे एजुकेशन सिस्टम में आज भी व्याप्त है और ये तब तक चलती रहेगी जब तक टीचर्स कोई बड़ा कदम नहीं उठाएंगे। अपनी जिम्मेदारी को नहीं समझेंगे। उन्हें समझना होगा कि उन्हें सिर्फ थ्योरिटिकल ज्ञान ही नहीं देना है बल्कि प्रेक्टिकल ज्ञान भी देना है जिससे बच्चों के सोचने समझने का लेवल बढ़ सके।

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