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Saturday, September 22nd, 2018 05:55 PM
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ये हैं वो 5 कारण जिनकी वजह से रानी लक्ष्मीबाई को गंवानी पड़ी थी अपनी जान




ये हैं वो 5 कारण जिनकी वजह से रानी लक्ष्मीबाई को गंवानी पड़ी थी अपनी जानSocial



चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी।।।खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झांसी वाली रानी थी’, कवियत्री सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा रचित यह रचना हमारे जेहन में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की एक छवि सहसा ही बना देती है। वही लक्ष्मीबाई, जिसे भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में अहम भूमिका निभाने के लिए याद किया जाता है।

अंग्रेजों के खिलाफ लड़ते-लड़ते वह वीरांगना मात्र 23 साल की उम्र में वीरगति को प्राप्त हुई। कुछ एतिहासिक तथ्य इस ओर इशारा करते हैं कि रानी लक्ष्मी बाई की मृत्यु 18 जून 1958 को हुई थी। कहा जाता है कि अगर रानी लक्ष्मी बाई का बलिदान नहीं हुआ होता तो, तो शायद देश को आजादी के लिए 90  साल तक इंतज़ार नहीं करना पड़ता।

ये हैं वो पांच कारण

दूल्हा जू ने ओरछागेट खोलकर की गद्दारी

20 मार्च 1858 का वह काला दिन। इस दिन अंग्रेजी सेनानायक जनरल ह्यूरोज़ ने फौज के साथ जह्न्सी के किले को घेर लिया था। तीन दिन की घेराबंदी के बाद 23 मार्च को युद्ध शुरू हुआ। रानी लक्ष्मीबाई, उनकी सेना और जनता ने अंग्रेजी फौज को डटकर मुकाबला किया। हजारों लोग आहात और हताहत हुए। इसके बावजूद रानी ने हार नहीं मानी। दुर्भाग्यवश दुल्हाजू जैसे देशद्रोहियों ने ओरछा द्वार खोल दिया। अंग्रेजों ने नगर में मारकाट मचा दी। नगर युद्धशाला में अबदल गया। दस दिन तक मारकाट, आगजनी और लूटपाट होती रही। 4 अप्रैल को रानी किले से बहार निकलीं और विश्वस्त सिपाहियों के साथ कालपी की ओर कूच कर गयीं।

आसपास के राजाओं ने नहीं दिया साथ

इतिहासकार मुकुंद मेहरोत्रा बतातें हैं कि मराठा राजाओं ने अपने शासनकाल में आसपास की रियासतों से बलपूर्वक लगान की वसूली की। लगान वसूली में अनेक तरह के अत्याचार किये गए। उन्हें झाँसी के किले में बंदी बनाकर यातनाएं दी गयीं। उस वक़्त की इसी नाराजगी के कारण आसपास के राजा भी जरुरत पड़ने पर रानी के साथ खड़े नहीं हुए।

दतिया के कुछ लोगों ने खेला दो तरफ़ा खेल

इसके अलावा दतिया राजघराने के करीबी रहे कुछ लोगों ने भी दो-तरफ़ा खेल खेला। वे लोग एक तरफ तो रानी झाँसी के विश्वासपात्र बने रहे और दूसरी तरफ अंग्रेजों के। ये लोग रानी से जुडी सारी सूचनाएं लेकर अंग्रेजों तक पहुंचतें थे।

ग्वालियर के राजा सिंधिया पहुँच गए थे अंग्रेजों की शरण में

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के नेतृत्व में सभी सेनानायक ग्वालियर पहुंचे। तब ग्वालियर के राजा सिंधिया ने रानी झांसे के मदद करना मुनासिब नहीं समझा और वह अंग्रेजों के शरण में आगरा चले गए। इधर रानी झाँसी किले पर अधिकार कर लिया।

रानी का नया घोडा नहीं कर सका था नाला पार

17 जून  1858 को अंग्रेजों के एक बड़ी फौज ने गवा;लिओर को घेर लिया था। दोनों सेनाओं में घमसान युद्ध हुआ। रानी लक्ष्मीबाई किले से बाहर निकली और आगे बढ़ने लगीं। अंग्रेज़ उनका पीछा कर रहे थे। रानी का घोडा नया था। वह स्वर्ण रेखा नाला पार नहीं कर सका। रानी के चरों ओर फिरंगी सैनिक मौजूद थे। इसी बीच सैनिकों ने रानी झाँसी पर हमला कर दिया। इससे रानी अचेत हो गयीं। इसी बीच रानी के सैनिकों ने अंग्रेजों की टुकड़ी का सफाया किया और रानी को लेकर सैनिक आगे बढ़ गए। वहां गंगादास की कुटी में रानी ने सैनिकों से अपनी चिता बनवाई और खुद अग्नि प्रज्ज्वलित करके खुद बलिदान कर दिया।

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