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Saturday, April 21st, 2018 04:07 PM
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सेविंग्स से हटकर लोन की तरफ जाता हमारा खतरनाक फाइनेंशियल मैनेजमेंट




सेविंग्स से हटकर लोन की तरफ जाता हमारा खतरनाक फाइनेंशियल मैनेजमेंटBusiness



बचत-बचत-बचत अब सिर्फ याद की बात हो गई। जो कभी हमारे पैसों की मूल व्यवस्था थी, जिसको हम अपने बच्चों में बचपन से ही संस्कार के रूप में डालते आए हैं वही अब खत्म सी हो गई है। पहले हमारे पैरेंट्स हमें विरासत में अपनी जीवनभर की कमाई दे कर जाया करते थे वह उलट हो कर्ज में तब्दील हो गई है। कारण साफ है सरकार द्वारा लगातार अपनी नीतियों में परिवर्तन कर हमारा संपूर्ण फाइनेंशियल मैनेजमेंट उस ओर धकेल रही है। पूर्व की सरकार हो या वर्तमान सरकार तीव्र गति से हम इस ओर बढ़ चले हैं। सेविंग्स के सभी रास्ते एक-एक कर बंद हो रहे हैं फिर वह चाहे नगद सेविंग्स हो या बैंक में जमा से, पोस्ट ऑफिस में जमा से हो या फिर कोई और। इतने कम इंट्रेस्ट रेट कर दिए है कि आप उसमें रखें या न रखें कोई फर्क कोई ख़ास नहीं है। आय न के बराबर है। सेविंग्स का कोई भी रूप हो नगद, बैंक, सोना-चांदी या प्रॉपर्टी सभी तरफ सरकार के अंकुश होते जा रहे हैं। सभी में राशनिंग कर लिमिट तय कर रहे हैं।

सभी जमा रकम को बाहर लाना

सरकार ने नोटबंदी कर सभी परिवारों में से उसकी नगद जमा (सेविंग्स) को बाहर लाने का काम कर दिया। भविष्य में अपने परिवार को वित्तीय सुरक्षा देने के लिए महिलाएं, पुरूष, बच्चे जो अपनी कमाई में से, खर्च में से कटौती कर कुछ पैसा भविष्य के लिए, अचानक किसी संकट से निपटने के लिए बचा के रखा जाता था उसे भी सामने लाने, लोगों को कैशलेस करने का बड़ा कार्य किया जो कभी भी गंभीर स्थिति में उस परिवार को ला सकता है। मंदी के समय ये बचत बहुत काम की होती है। यदि कोई हमारे परिवार का कमाने वाला सदस्य किसी प्रकार न कमा पाए तो ये रकम परिवार को बहुत संबल देती है।

मंदी की मार न झेल पाना

पूर्व में विश्वभर में मंदी आई थी किंतु हमारे भारतवर्ष में इसका असर न के बराबर हुआ। वजह स्पष्ट थी कि हमारे पास इस जमा रकम के रूप में एक शॉक अप था जिसने हमें इस संकट से बचा लिया। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी ने इसे स्वीकारा भी था किंतु अब यदि कभी भी यदि ऐसी मंदी देखने को मिलती है तो हम नहीं झेल पाएंगे। वैसे लगातार हम इस मंदी के संकट से जूझ भी रहे हैं और संकट झेल भी रहे हैं। अनेकों व्यवसायियों ने बाज़ार में हाथ ऊंचे कर दिए हैं। लोगों को वापस देना बंद कर दिया है जिससे सभी को वित्तीय संकटों का सामना करना पड़ रहा हैं। यह तो वह सायकल होती है जहां रूकती है वहां सभी को रोक देती है जिसकी वजह से एक-एक करके अनेक संकटों में आते जा रहे हैं किंतु सरकार का ध्यान इस ओर बिल्कुल भी नहीं है।

छोटे और मझले व्यावसायी पर से सरकार का ध्यान हटना

खुन्नस बोलें, नासमझी बोलें या सोच का दिवालियापन एक खतरनाक व्यवस्था की तरफ हम बढ़ रहे हैं। लोकल व्यवसाय, छोटे और मझले व्यवसाय, दुकान, फैक्ट्री इत्यादि किसी भी देश की रीढ़ की हड्डी होती हैं जिस पर देश की संपूर्ण व्यवस्था टिकी होती है माना कि यह अनऑर्गेनाइज़्ड है। सरकार को इनसे सीधे तौर पर इतना लाभ नहीं मिलता है इसलिए सरकार ने अपनी नीतियों के जरिए इतने अंकुश लगा दिए है कि यह सब बर्बादी की तरफ जा चुके हैं। सरकार का सीधे तौर पर ऑर्गेनाइज़्ड व्यवसाय, बड़े कॉरपोरेट हाउस, मल्टी नेशनल से फायदा ज़्यादा मिल रहा था। उनकी तमाम नीतियां उन्हीं को संपूर्ण मार्केट सौंपने की हो गई। सभी सरकारी नियम उस हेतु बनते जा रहे हैं। एफडीआई को 100 प्रतिशत ले जाना भी उसी बात को इंगित करता है।

प्रथम दृष्टी में तो यह सरकार के लिए फायदे का दिख रहा है। कम लोगों में अधिकतम टैक्स मिलना किंतु सरकार का काम सिर्फ टैक्स कमाना नहीं है देश के तमाम लोगों काम दिलाना, उनका विकास करना भी है ताकि वे उन्नति कर सके। जब लोकल, छोटे लोगों का काम ही बंद हो जाएगा तो न उनकी कमाई होगी, न वे कुछ खर्च करने लायक बचा पाएंगे। ऐसे में बाज़ार की संपूर्ण व्यवस्था ही ठप्प हो जाएगी। जब व्यापार नहीं होगा तो सरकार भी टैक्स कहां से लेगी।

कुल मिलाकर अंत में सरकार को भी अपनी इस गलती का एहसास होगा। बड़ी कंपनियां भी जब तक लाभ मिलता रहेगा, करती रहेगी। जैसे ही लाभ-घाटे में बदलेगा वह भी यहां से चली जाएगीं। उनका देश और देशवासियों से कोई लेना-देना नहीं होता। वे तो सिर्फ लाभ कमाना जानती हैं। विजय माल्या या ऐसे अनेकों उदाहरण हमें देखने को मिल जाएंगे।

लोगों को कर्ज की व्यवस्था की ओर ले जाना

बचत को खत्म करने का दूसरा प्रहार लोगों को कर्ज की ओर ले जाना है। पूर्व में कर्ज लेना जीवन की मजबूरी माना जाता था। कर्ज देने वाला भी बहुत जानकारी लेने के बाद कर्ज देता था किंतु वर्तमान में बैंक और फाइनेंशियल इंस्टीट्यूट कर्ज लेने को अच्छा मानते हैं। आज कुछ भी आप लोन के रूप में ले सकते हैं। हर वस्तु आसानी से उपलब्ध होने लग गई है। जब से बैंकों का प्राइवेटलाइजेशन हुआ है लोन बहुत ही आसान हो गया है आम आदमी अपनी लिमिट क्रॉस कर कैपिसिटी से ज़्यादा, फ्यूचर इनकम के दम पर अधिकतम लोन उठा लेता है किंतु यही स्थिति सभी के लिए खराब होती जा रही है। जरा भी संकट उसे ले डूबता है। उसके साथ बैंक भी नुकसान में आ जाती है। यही इन दिनों हो रहा है। बैंकों की माली हालात खराब हो चली है।

कुल मिलाकार बात यह सामने आती है सरकार द्वारा त्वरित फायदे के लिए हमारी संपूर्ण वित्तीय व्यवस्था को जिस प्रकार तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है वह खतरनाक हो सभी की बर्बादी की कहानी लिख रहा है। न आम लोगों का फायदा है, न बिजनेसमैन को और न ही सरकार को फायदा है। फायदा सिर्फ उन्हें है जो सिर्फ आज की सोच अपने मतलब और फायदे को लेकर निकल जाने में विश्वास करते हैं उन्हें हैं। जो सभी के लिए घातक है। एक आत्म हत्या करने के समान है। यदि सरकार को नीयत में साफगोइता हो तो वे इस पर जरूर सोचें। उनका एक बजट सही नीति, संपूर्ण देश के विकास की गाथा लिख सकती है।

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