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Saturday, December 16th, 2017 05:19 PM
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स्मार्ट सिटी बनाने के चक्कर में सब कुछ लूट लिया सरकार ने




स्मार्ट सिटी बनाने के चक्कर में सब कुछ लूट लिया सरकार ने

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स्मार्ट सिटी एक अच्छा शब्द सुनने-पढ़ने में बहुत अच्छा लगता है और यदि वह बन जाए तो और अच्छा लगता है। जब से सरकार ने इसकी घोषणा की है कई शहर इस कार्य में जुट गए, अच्छी बात है। इंदौर शहर गत वर्ष प्रथम स्थान पर आया। साफ-सफाई का अभियान युद्ध स्तर पर छिड़ा था, पूरा शहर सफाई को लेकर जागरूक दिखा। सफाई जरूरी है किंतु सिर्फ सफाई से ही काम नहीं चलता। शहर को स्मार्ट बनाने के लिए सुंदर सड़क, सुंदर लाइटिंग, साफ-सफाई आदि से ही काम नहीं चलता वहां रहने वाले बाशिंदे भी स्मार्ट बनना चाहिए। उनके चेहरे पर भी रौनक, खुशी होना चाहिए। उनके काम अच्छे चलें तो वे स्वंय भी शहर को स्मार्ट बनाने में अपना जी-जान लगा देते। यह बात सरकार को समझ आ जाना चाहिए वर्ना सरकार ऐसे पुरस्कार पाकर स्वयं ही खुश हो ले, जनता नहीं हो पाएगी।

अभी हाल ही में इंदौर शहर की प्रसिद्ध पहचान ‘होलकर राज का राजवाड़ा’ का हाल यही हो रहा है। इसके आसपास काफी सारे दुकानदार 50 वर्षों से भी अधिक अपने व्यावसाय में रत थे किंतु एक फरमान और उस पर की गई त्वरित कार्यवाही ने सबकुछ तबाह कर दिया। सड़कें तो चौड़ी हो गई, राजवाड़ा भी दिखने लगा किंतु वह सब किस क़ीमत पर यह समझ लेना आवश्यक है। बात यह नहीं है कि यह होना चाहिए था बात यह है कि किस प्रकार होना चाहिए था। ऐसे ही पूर्व में भी अनेकों सड़कों पर इस प्रकार की कार्रवाई की गई। वैध-अवैध सब पर कार्यवाही हुई। अच्छी दिखीं सड़कें किंतु इस कार्यवाही में जिन लोगों के स्थान गए, व्यावसाय चौपट हुआ, घर बर्बाद हुए उन सबकी दयनीय स्थिति पर कोई ध्यान ही नहीं।

कोई उनके लिए बेकअप प्लान नहीं। जो लोग जिम्मेदार थे अफसर-नेता सब मालामाल होकर अलग हट चुके हैं। उन पर कोई कार्यवाही नहीं इसको भुगता सिर्फ और सिर्फ उन लोगों ने। ऐसा सभी दूर हो रहा है। आखिर उनके आंसूओं पर हम अपने विकास की इबारत कैसे लिख सकते हैं? कैसे इस पर खुश हो सकते है? आखिर ये लोग भी तो हमारे अपने शहर के हैं। क्या इनके आंसूओं से किसी का कोई लेना-देना नहीं है? क्या इस शहर के नेता-अफसर इतने निष्ठुर हो गए हैं? क्या हमें इनके रूदन की लागत पर विकास की मंजिल को खड़ा करना चाहिए? क्या इससे संबंधित अफसरों पर कोई कार्यवाही नहीं होनी चाहिए? सरकार को इतना निर्दयी, निष्ठुर न होकर संवेदनशील होना चाहिए। विकास हो किंतु वह किस लागत पर किस तरीके से हो रहा है, यह भी देखा जाना चाहिए।

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