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Thursday, August 16th, 2018 05:53 AM
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ये हैं भारतीय फुटबॉल टीम के पहले कप्तान, इंदिरा गांधी को किया था रिप्लेस




ये हैं भारतीय फुटबॉल टीम के पहले कप्तान, इंदिरा गांधी को किया था रिप्लेसSports



आज अगर दुनिया में किसी खेल की चर्चा है तो वो है फुटबॉल। फीफा विश्व कप में फ्रांस के जीत जाने के बाद लोग फ्रांस को सैल्यूट कर रहे हैं। मैच जीतने का सबसे ज्यादा श्रेय अगर किसी को जाता है, तो वो है टीम का कप्तान। इन्हीं के बदौलत टीम में स्पीरिट बनी रहती है साथ ही टीम सदस्यों ही हौंसलसअफजाई करने में कप्तान का बहुत बड़ा योगदान रहता है। आज हम आपको फुटबॉल के ऐसे पहले कप्तान के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनका नाम फुटबॉल खेल के इतिहास में दर्ज है, लेकिन बहुत कम लोग इनके बारे में जानते हैं। इतिहास के पन्नों में एक ऐसा ही नाम दर्ज है डॉ.तालिमेरन आओ।

इनके बारे में शायद ही कभी किसी ने सुना हो। आओ को इंदिरा गांधी का नाम हटाने वाला पहला शख्स माना जाता है। नागालैंड में वीआईपी कल्चर को खत्म करने का पूरा श्रेय आओ को जाता है। नागालैंड के इंदिरा गांधी के नाम पर बने स्टेडियम को बाद में वीआईपी कल्चर खत्म होने के बाद आओ के नाम पर रखा गया था।

डॉक्टर बनना था इसलिए छोड़ दी फुटबॉल-

आओ भारतीय फुटबॉल टीम के पहले कप्तान थे। एक फुटबॉलर के साथ वे एक डॉक्टर भी थे। रोचक बात ये है कि उन्होंने डॉक्टर बनने के लिए फुटबॉल छोड़ दी थी।  तालिमेरेन आओ नागालैंड क्षेत्र के पहले फुटबॉलिंग नायक बनकर उभरे थे। देखने में 5 फीट 10 इंच की हाइट जो एक आदर्श फुटबॉलर के लिए मायने रखती है।

रेत में सीखी थी फुटबॉल-

आओ असम के तत्कालीन नागा हिल्स जिले के गांव चांगकी में पैदा हुए थे जो आज नागालैंड के मोकोकचंग जिले में आती है। आओ की जनजाति एओएस नागालैंड के 16 जनजातियों में से एक हैं। डॉ एओ 12 बहन-भाइयों में 4 नंबर की संतान थे। तीन साल बाद आओ का परिवार मोकोकचंग शहर के पास, इंपपुर मिशन कंपाउंड में शिफ्ट हो गया। घर के पास एक ऐसा क्षेत्र था जहां लड़के रेत पर एक गेंद को लात मारकर खेलते थे। यही से पहली बार आओ को इस खेल में रुचि पैदा हुई थी।

पिता की आखिरी इच्छा पूरी करने के लिए बने डॉक्टर-

इसी दौरान आओ के पिता की टाइफाइड से मौत हो गई। उनके पिता की इच्छा थी कि वो लोगों की सेवा करें और बड़े होकर डॉक्टर बने। 1933 में, टी आओ को जोरहाट मिशन स्कूल में भेजा गया जहां उन्हें करीब से फुटबॉल को देखा। इनके इस टैलेंट को टीचक और छात्रों दोनों ने नोटिस किया। एओ 1937 में कपास कॉलेज में शामिल होने के लिए गुवाहाटी गए। जिसके बाद वह असम के सबसे बड़े फुटबॉल क्लब, महाराणा क्लब के शामिल हुए। क्लब में  एओ को एक स्ट्राइकर से, डिफेंडर/ मिडफील्डर रखा गया। अपने समय में एओ ने शानदार फुटबॉलिंग सीखी और अपने खेल में सुधार भी किया। लेकिन एक बाद उनके दिमाग में घुमती रही. वो अपने पिता की आखिरी इच्छा। 1942 में आओ ने असम के लिए दो आरक्षित सीटों में से एक को कोलकाता के कारमिचेल मेडिकल कॉलेज में दाखिला ले लिया।

इनके खेल के प्रति बढ़ते लगाव को देख आओ को भारतीय राष्ट्रीय टीम में शामिल किया गया, जहां उन्हें फिर से कप्तान बनने के लिए चुना गया। कप्तान बनने के बाद उन्होंने 1948 के लंदन ओलंपिक में भारतीय टीम का नेतृत्व किया।

उन्होंने अपने पिता से डॉक्टर बनने का वादा किया था, जिस कारण उन्हें फुटबॉल से मुंह मोडऩा पड़ा। अपने शहर कोहिमा में सिविल हॉस्पीटल में वो असिस्टेंट सिविल सर्जन बन गए थे। 1978 में वे रिटायर हो गए। 1998 में 80 साल की उम्र में उनका निधन हो गया। आपको शायद न पता हो, लेकिन नागालैंड को राज्य का दर्जा मिलने का श्रेय आओ को जाता है।

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