page level


Tuesday, December 12th, 2017 11:40 PM
Flash




मैसूर में दशहरा महोत्सव शुरू, देखिए 600 साल से चली आ रही परंपरा की एक झलक




मैसूर में दशहरा महोत्सव शुरू,  देखिए 600 साल से चली आ रही परंपरा की एक झलकArt & Culture

Sponsored




भारत में 30 सितंबर को दशहरा मनाया जाएगा। इस दिन देशभर में रावण के पुतले जलाए जाएंगे। लेकिन इस दौरान कर्नाटक के मैसूर शहर का नजारा ही कुछ और होता है। ये तो आप सभी जानते होंगे कि मैसूर का दशहरा न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी काफी मशहूर है। मैसूर में दशहरा मनाने की ये अद्भुत परंपरा पिछले 600 साल से चली आ रही है। ये नजारा इन दिनों यहां देखने को मिल रहा है। बता दें कि मैसूर में पांच छह दिन पहले से ही दशहरा उत्सव शुरू हो जाता है, जिसे देखने के लिए लाखों लोगों की भीड़ उमड़ती है। इस बार कनार्टक सरकार ने 44 कैबिन वाली लक्जरी ट्रेन का आयोजन किया है।

यहां कला, संस्कृति और परंपरा का अनूठा मिलन देखने को मिलता है। यह पर्व ऐतिहासिक दृष्टि से तो महत्वपूर्ण है ही साथ ही देवी द्वारा महिषासुर के वध का भी प्रतीक है।

आम लोगों के लिए खुला राज दरबार-

दशहरा उत्सव के लिए मैसूर का राजदरबार आम लोगों के लिए खोल दिया जाता है। शानदार जुलूस निकलता है। दसवें और आखिरी दिन मनाए जाने वाले इस त्योहार को जम्बू सवारी कहा जाता है। इस दिन सभी की निगाहें बलराम नलाम के हाथी के सुनहरे हौदे पर टिकी होती हैं। क्योंकि मां चामुंडमेश्वरी देवी इस हौदे पर सवार होकर शहर का भ्रमण करती हैं। खास बात ये है कि इस हाथी के साथ 11 गजराज भी रहते हैं। वैसे साल में ये एक ही मौका होता है जब देवी मां शहर की सैर करती हैं।

 

कई मध्यकालीन पर्यटकों तथा लेखकों ने अपने यात्रा वृत्तान्तों में विजयनगर की राजधानी ‘हम्पी’ में भी दशहरा मनाए जाने का उल्लेख किया है। इनमें डोमिंगोज पेज, फर्नाओ नूनिज और रॉबर्ट सीवेल जैसे पर्यटक भी शामिल हैं। इन लेखकों ने हम्पी में मनाए जाने वाले दशहरा उत्सव के वर्णन किये है।

विजयनगर शासकों की यही परंपरा वर्ष 1399 में मैसूर पहुँची, जब गुजरात के द्वारका से ‘पुरगेरे’ (मैसूर का प्राचीन नाम) पहुँचे दो भाइयों यदुराय और कृष्णराय ने वाडेयार राजघराने की नींव डाली। यदुराय इस राजघराने के पहले शासक बने।

Sponsored






Loading…

Subscribe

यूथ से जुड़ी इंट्रेस्टिंग ख़बरें पाने के लिए सब्सक्राइब करें