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15/01/2018

5 दिन महिलाएं नहीं पहनती कपड़े, ऐसी है इस गांव की परंपरा




5 दिन महिलाएं नहीं पहनती कपड़े, ऐसी है इस गांव की परंपराArt & Culture

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दुनिया भले ही चांद पर पहुंच जाए लेकिन हमारी परंपराएं और रीति रिवाज़ आज भी उतने ही जीवन्त है जितने पहले हुआ करते थे। विज्ञान ने आज भले ही कितनी तरक्की कर ली हो लेकिन अब भी वो कई सवालों के जवाब देने में असमर्थ है। सभी जगहों के अलग-अलग रीति रिवाज होते हैं जिनमें कई जगहों पर कुछ अजीब रिवाज होते हैं।

अजीब रिवाज के मामले में जब आप हिमाचल के पीणी गांव के बारे में जानेंगे तो आप दंग रह जाएंगे। हिमाचल प्रदेश की मणिकर्ण घाटी में स्थित पीणी गांव आज भी कई परंपराओं को निभाता चला आ रहा है। यहां के लोग, यहां की परंपराएं काफी अनोखी है जिनमें इनका पूरा-पूरा विश्वास है तो आइये आपको बताते है यहां की कुछ ख़ास परंपराओं के बारे में

एक इंसान की ज़िन्दगी का सबसे अहम हिस्सा होता है शादी। शादी के बाद पति-पत्नि में हंसी-मजाक, नोंक-झोंक तो चलती ही है। लेकिन यहां मामला कुछ उल्टा है। यहां पर साल के पांच दिन तक पति-पत्नि एक दूसरे से हंसी मजाक नहीं कर सकते। उन्हें एक दूसरे से बिलकुल अंजान बनकर रहना होता है।

इस गांव में महिलाओं के लिए एक ऐसी परंपरा भी है जिसे हर कोई न निभा पाए। इस गांव की महिलाएं साल के पांच दिन तक कपड़े ही नहीं पहनती हैं। इस दौरान वे पुरूषों के सामने भी नहीं आती है। इसके संदर्भ में माना जाता है कि अगर कोई महिला इसका निवर्हन न करे तो उसके घर कुछ अशुभ हो जाता है।

शराब पीना वैसे बुरी बात है और सरकार इस पर काफी लगाम भी कस रही है। लेकिन कुछ लोग दुनिया में ऐसे भी होते है जिनका शराब के बिना गुजारा होना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है और अगर आप पीणी गांव में हैं तो फिर यहां पांच दिन के लिए आपको शराब पीने क्या सूंघने को भी नहीं मिलेगी। यहां लोग पांच दिनों तक शराब का सेवन भी नहीं करते हैं।

इन अजीब-गरीब परंपराओं को पढ़कर आपके दिमाग में एक प्रश्न आया होगा कि ये ऐसा क्यों करते हैं और ये कौन से पांच दिन है? तो आपको बता दें कि ये पांच दिन 17 से 21 अगस्त के हैं जिसे काला महीना भी कहा जाता है। इन दिनों लोग शराब का सेवन नहीं करते हैं और इस तरह की अजीब चीज़ें करते हैं।

यहां के लोगों का मानना है कि लाहुआ घोंड देवता जब पीणी पहुंचे थे तो उस दिन राक्षसों का आतंक था। भादो संक्रांति को यहां काला महीना कहा जाता है। इस दिन देवता ने पीणी में पांव रखते ही राक्षसों का विनाश किया था। कहा जाता है कि इसके बाद से ही ये परंपरा शुरू हुई थी, जो आज भी कायम है।

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