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Monday, July 23rd, 2018 12:09 AM
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दिल्ली: उपराज्यपाल का ‘विषदंत’ टूटा, केजरीवाल को अभयदान




दिल्ली: उपराज्यपाल का ‘विषदंत’ टूटा, केजरीवाल को अभयदानPolitics



कमलेश पांडे. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के संविधान प्रदत्त अधिकारों पर केंद्र की शह पर दिल्ली के उपराज्यपाल अनिल बैजल आए दिन जो अड़ंगा लगा रहे थे, उसके दिन अब लद गए। क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय की एक पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने यह स्पष्ट कर दिया कि उपराज्यपाल के पास कोई स्वतंत्र अधिकार नहीं है और वह मंत्रिपरिषद की सलाह पर काम करने के लिए बाध्य हैं। कोर्ट के इस नजरिए से स्पष्ट है कि जहां उपराज्यपाल का विषदंत टूट गया, वहीं सीएम केजरीवाल को अभयदान मिला है।

देखा जाए तो यह केजरीवाल सरकार की सबसे बड़ी जीत है और मोदी सरकार की शर्मनाक हार। ऐसा इसलिए कि 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में नवगठित ‘आप’ पार्टी (67/70) के हाथों बुरी तरह से शिकस्त खाई बीजेपी (3/70) ने दिल्ली में उपराज्यपाल के मार्फ़त पहले समानांतर, फिर एकाधिकारवादी शासन करने का जो विफल प्रयास किया, वह किसी काला अध्याय से कम नहीं। इस बात में कोई दो राय नहीं कि युवा तुर्क नेता अरविंद केजरीवाल द्वारा दिल्ली के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद तत्कालीन उपराज्यपाल नजीब जंग द्वारा उनकी राहों में वैधानिक अधिकार के बहाने सियासी कांटे बिछाने का जो काम शुरू किया गया, वह उनके जाने के बाद भी बदस्तूर जारी रहा। क्योंकि नए उपराज्यपाल अनिल बैजल ने भी वैधानिक ऊहापोह वाली स्थिति का पूरा फायदा स्वहित में उठाया और केजरीवाल सरकार को नाकोदम किए रखा।

दरअसल बैजल के मौजूदा कार्यकाल में उपराज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच जारी जंग की गाज जब दिल्ली के मुख्य सचिव अंशु प्रकाश पर गिरी तो मामला और बिकराल रूप धारण कर लिया। हालांकि इसका पटाक्षेप तब हुआ जब मुख्यमंत्री केजरीवाल उपराज्यपाल के मुलाकाती कक्ष में ही नौ दिवसीय धरने पर जम गए और बाद में नौकरशाहों से सुलह कर लिए। सच कहा जाए तो भारतीय लोकतंत्र में अपने आप में एक अनोखा विवाद समझा जाने वाला दिल्ली के उपराज्यपाल-मुख्यमंत्री विवाद में केंद्रीय गृह मंत्रालय और दिल्ली उच्च न्यायालय के कतिपय दिशानिर्देशों ने आग में घी का काम किया जिससे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का संघर्ष भले ही कुछ लम्बा खींच गया और व्यक्तिगत तौर पर उनकी भारी फजीहत हुई।

लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के ताजा फैसले से यह स्पष्ट हो गया कि दिल्ली की वास्तविक संवैधानिक शक्ति मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद के पास है, न कि उपराज्यपाल के पास। क्योंकि न्यायालय की संविधान पीठ ने ताजा व्यवस्था दी कि उपराज्यपाल को फैसले लेने का कोई स्वतंत्र अधिकार नहीं है और वह निर्वाचित सरकार की सलाह से ही काम करने के लिए बाध्य हैं। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से अपना निर्णय देते हुए स्पष्ट कहा कि ‘निरंकुशता और अराजकता के लिये कोई जगह नहीं है। उपराज्यपाल, जिसकी नियुक्ति केन्द्र करता है, ‘विघ्नकारक’ के रूप में काम नहीं कर सकते।

बेशक, संविधान पीठ ने तीन अलग-अलग लेकिन सहमति से दिए गए फैसले में कहा कि उपराज्यपाल के पास स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने का कोई अधिकार नहीं है। संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति ए के सिकरी, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर, न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ और न्यायमूर्ति अशोक भूषण शामिल थे। स्पष्ट है कि पीठ की इस व्यवस्था ने केजरीवाल को सही ठहरा दिया। उसने उपराज्यपाल के लिये पहली बार स्पष्ट दिशानिर्देश प्रतिपादित किए और दिल्ली, जो पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिलने के बावजूद अपने विधायकों को चुनती है और सरकार बनाती है, में कार्यपालिका की दो शाखाओं के अधिकारों को स्पष्ट रूप से निरूपित किया है।

बता दें कि केजरीवाल लंबे समय से बैजल पर आरोप लगा रहे थे कि वह केन्द्र के इशारे पर उन्हें ठीक से काम नहीं करने दे रहे हैं। लिहाजा, शीर्ष अदालत ने कहा कि सार्वजनिक व्यवस्था, पुलिस और भूमि के अलावा दिल्ली सरकार को अन्य विषयों पर कानून बनाने और शासन करने का अधिकार है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि शीर्ष अदालत की ताजा व्यवस्था के बाद सेवायें दिल्ली सरकार के अधीन आ जाएंगी और राजनीतिक नेतृत्व का नौकरशाहों के तबादले और तैनाती में दखल होगा। यही वजह है कि उपराज्यपाल बैजल ने शीर्ष अदालत की इस व्यवस्था पर तत्काल कोई टिप्पणी नहीं की।

खास बात यह है कि सर्वोच्च न्यायालय का ताजा फैसला आते ही आम आदमी पार्टी के समर्थक और कार्यकर्ताओं ने दिल खोलकर जश्न मनाना शुरू कर दिया। अधिकांश जगहों पर वे सड़कों पर निकल आए और लोगों के बीच मिठाइयां बांटी। मुख्यमंत्री केजरीवाल ने ट्वीट करके कहा कि ‘‘यह दिल्ली की जनता के लिये बहुत बड़ी विजय है।’ उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने भी इसे ऐतिहासिक फैसला करार दिया। उधर, दिल्ली प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय माकन ने भी कहा कि चूंकि शीर्ष अदालत ने दिल्ली में अधिकारों की स्थिति स्पष्ट कर दी है, इसलिए हम उम्मीद करते हैं कि विकास कार्य, जो कांग्रेस के सत्ता से बाहर होने के बाद थम सा गया था, अब फिर से शुरू हो जाएगा।

हालांकि, न्यायालय ने कहा कि मंत्रिपरिषद, जो दिल्ली की जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि हैं, के सारे फैसलों की जानकारी उपराज्यपाल को दी जानी चाहिए, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि इसमें उनकी सहमति की आवश्यकता है। शीर्ष अदालत ने दो टूक कहा कि ‘निरंकुशता के लिये कोई स्थान नहीं है और अराजकता के लिये भी इसमें कोई जगह नहीं है।’ वाकई संविधान पीठ का यह निर्णय आप सरकार के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल, जिनका उपराज्यपाल के साथ लगातार संघर्ष चल रहा था, के लिये बहुत बड़ी जीत है। क्योंकि शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कहा कि भूमि और कानून व्यवस्था के अलावा दिल्ली सरकार के पास अन्य विषयों पर कानून बनाने और शासन करने का अधिकार है।

बता दें कि संविधान पीठ ने दिल्ली उच्च न्यायालय के चार अगस्त, 2016 के फैसले के खिलाफ केजरीवाल सरकार द्वारा दायर कई अपीलों पर यह फैसला दिया। क्योंकि उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था कि उपराज्यपाल ही राष्ट्रीय राजधानी के प्रशासनिक मुखिया हैं। जबकि, उच्च न्यायालय के फैसले से असहमति व्यक्त करते हुये शीर्ष अदालत ने साफ कहा कि उपराज्यपाल को यांत्रिक तरीके से काम करते हुये मंत्रिपरिषद के फैसलों में अड़ंगा नहीं लगाना चाहिए।

संविधान पीठ ने साफ कहा कि उपराज्यपाल को कोई स्वतंत्र अधिकार प्रदान नहीं किए गए हैं, लेकिन वह मतैक्य नहीं होने की स्थिति में अपवाद स्वरूप मामलों को राष्ट्रपति के पास भेज सकते हैं। बावजूद इसके, उपराज्यपाल को मंत्रिपरिषद के साथ सद्भावना पूर्ण तरीके से काम करना चाहिए तथा परिस्थितिवश उत्पन्न मतभेदों को विचार विमर्श के साथ दूर करने का प्रयास करना चाहिए। खास बात यह कि न्यायमूर्ति चन्द्रचूड़ ने अन्य न्यायाधीशों से सहमति व्यक्त करते हुए अपने अलग निर्णय में कहा कि “असली ताकत तो मंत्रिपरिषद के पास होती है। इसलिए उपराज्यपाल को यह ध्यान रखना चाहिए कि वह नहीं बल्कि मंत्रिपरिषद को ही सारे फैसले करने हैं। उपराज्यपाल को यह भी महसूस करना चाहिए कि मंत्रिपरिषद ही जनता के प्रति जवाबदेह है।”

न्यायमूर्ति भूषण ने भी अपने अलग फैसले में कहा कि सभी सामान्य मामलों में उपराज्यपाल की सहमति आवश्यक नहीं है। बता दें कि बैजल और केजरीवाल के बीच रस्साकशी इस साल की शुरुआत में उस समय चरम पर पहुंच गई थी जब मुख्य सचिव अंशु प्रकाश ने स्पष्ट कर दिया था कि वह उपराज्पाल के प्रति जवाबदेह हैं। शायद यही वजह है कि सचिवालय में टकराव हुआ, जिसके बाद आप के एक विधायक ने प्रकाश को कथित रूप से चांटा जड़ दिया था। इसके बाद, दिल्ली के नौकरशाहों ने लगभग अघोषित हड़ताल कर दी तथा मंत्रियों की बैठकों में शामिल होने से स्पष्ट इंकार कर दिया। इससे परेशान केजरीवाल ने भी उपराज्यपाल के अतिथि कक्ष में नौ दिन तक धरना दिया था, जिसके बाद दोनों पक्षों के बीच काम करने की सहमति बन पाई।

दरअसल, आप सरकार का दावा था कि उपराज्यपाल बार-बार संविधान की जानबूझकर ‘अलग’ व्याख्या करके चुनी हुई सरकार के काम काज में बाधा डाल रहे हैं। संविधान पीठ के समक्ष इन अपीलों पर सुनवाई के दौरान आप सरकार ने स्पष्ट दलील दी थी कि उसके पास विधायी और कार्यपालिका दोनों के ही अधिकार हैं। मुख्यमंत्री और उनके मंत्रीपरिषद के पास कोई भी कानून बनाने की विधायी शक्ति है और बनाए गए कानूनों को लागू करने के लिए उसके पास कार्यपालिका के भी अधिकार हैं। आप सरकार ने यह भी दलील दी थी कि उपराज्यपाल विभिन्न प्रकार के प्रशासनिक फैसले ले रहे हैं जिससे लोकतांत्रिक तरीके से निर्वाचित सरकार के सांविधानिक जनादेश को पूरा करने के लिये संविधान के अनुच्छेद 239 एए की व्याख्या नितांत जरूरी है।

हालांकि, केन्द्र सरकार की दलील थी कि दिल्ली सरकार पूरी तरह से प्रशासनिक अधिकार नहीं रख सकती क्योंकि यह राष्ट्रीय हितों के खिलाफ होगा। इसके अतिरिक्त, उसने 1989 की बालकृष्णन समिति की रिपोर्ट का हवाला भी दिया जिसने दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं दिये जाने के कारणों पर विचार किया। साथ ही, केन्द्र ने सुनवाई के दौरान यह बताने का भी प्रयास किया कि राष्ट्रपति, केन्द्र सरकार और उपराज्यपाल को राष्ट्रीय राजधानी के प्रशासनिक मामले में प्राथमिकता प्राप्त है। लेकिन, न्यायालय ने लोकतंत्र के मौलिक तकाजे पर गौर किया और ऐसी स्पष्ट व्यवस्था दी कि दिल्ली सरकार धन्य हो गई। भले ही अधिकारों की जंग में उसका बेशकीमती वक्त जाया हुआ, लेकिन शेष मिले समय का भी यदि वह सदुपयोग कर लेगी तो निश्चित जानिए कि यहां की प्रबुद्ध जनता उसकी झोली अगली बार 2020 में भी भर दे।

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