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Wednesday, August 15th, 2018 02:40 PM
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कालामन, कालाधन और कलंकित वतन




कालामन, कालाधन और कलंकित वतनPolitics



कमलेश पांडे. जिस तरह से कालेधन के खिलाफ बड़ी और कड़ी कार्रवाई करते हुए आयकर विभाग ने 3500 करोड़ रुपये से ज्यादा मूल्य की सैंकड़ों बेनामी सम्पत्तियां, यथा- फ्लैट, दुकानें, आभूषण, वाहन आदि जब्त की हैं, वह स्वागतयोग्य कदम है। उम्मीद है कि आम चुनाव 2019 की दहलीज पर खड़ा राष्ट्र बेनामी सम्पत्तियों के खिलाफ एक सख्त और सशक्त अभियान चलाएगा, ताकि भ्रष्टाचार पर लगाम लगे और आर्थिक असमानता की खाई को एकहद तक पाटा जा सके। कहना न होगा कि ऐसे कलंक के खिलाफ नोटबन्दी व जीएसटी के बाद यह एक और बड़ा कदम है, जो इस बात की उम्मीद जगाती है कि अब बेनामी सम्पत्तियों को बढ़ावा देने वालों और इसके झूठे मद में अनर्गल प्रलाप करने वालों के दिन लदने वाले हैं।

बता दें कि केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) ने गत दिनों कहा कि आयकर विभाग ने बेनामी सम्पत्ति लेनदेन रोकथाम कानून जो कि 1 नवम्बर 2016 से प्रभावी है, के तहत कार्रवाई तेज कर दी है। दरअसल, इस कानून में बेनामी सम्पत्ति को पहले कुर्क करने और फिर उसे जब्त करने का प्रावधान है। इस कानून के तहत बेनामी सम्पत्ति धारक और बेनामी सम्पत्ति के लिये लेनदेन करने वालों को सात साल तक सश्रम कारावास की सजा हो सकती है। इसके अलावा सम्पत्ति के बाजार मूल्य का 25 प्रतिशत जुर्माना भी लग सकता है। उल्लेखनीय है कि आयकर विभाग ने मई 2017 में देशभर में अपने अन्वेषण निदेशालय के तहत 24 खास बेनामी रोकथाम इकाइयां गठित की हैं, जिसके प्रयासों के चलते 900 से अधिक सम्पत्तियों की अस्थायी तौर पर जब्ती की गई है जिसमें 2900 करोड़ रुपये से अधिक की अचल सम्पत्तियां शामिल हैं।

कहना न होगा कि जिस देश का कारोबारी और प्रशासनिक तबका कालाधन प्रवाह को मूक समर्थन प्रदान करता हो, वैसी ही नीतियों को तरजीह देने के लिये कतिपय कानून बनाने की सूबाई-राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय लॉबिंग करता-करवाता हो, जिनके अनैतिक और मौकापरस्त कॉकस को अधिकतर जनप्रतिनिधियों का नापाक समर्थन हासिल हो, वहां की केंद्र सरकार (विशेषकर नरेंद्र मोदी सरकार) यदि ऐसे ‘राष्ट्रविरोधी-जनविरोधी’ तत्वों के खिलाफ कोई बड़ी और कड़ी करवाई करने का नीतिगत फैसला लेती है, बेहद सख्त कार्रवाई करने-करवाने के लिये अपने मातहत प्रशासन को तैयार कर लेती है, और तमाम तरह के प्रलोभनों, उलाहनों तथा व्यवहारिक दांव-प्रतिदाँव के बावजूद भी अपने सख्त रुख पर कायम रहती है तो जनहित के नजरिये से यह बड़ा फैसला है, बड़ी करवाई है, जिसका तहेदिल से स्वागत किया जाना चाहिये।

दरअसल, कोई भी सरकार जनता द्वारा दिये जाने वाले कर से ही चलती है। विविध तरह के करारोपणों से एकत्रित धनराशि से ही वह जनकल्याण और राष्ट्रीय विकास के कार्यक्रमों को सम्पादित करती है। लेकिन देखा जाता है कि निम्न और मध्यम वर्ग तो अपने हिस्से का कर अदा करता रहता है, किंतु तथाकथित उच्च वर्ग करवंचना के नए नए रास्ते तलाशता फिरता है जिससे कालाधन का सृजन होता है। तरह तरह के रिश्वतों, अवांक्षित उपहारों और सरकारी कामों में होने वाले घपलों-घोटालों से भी कालाधन सृजित होता है। कहना न होगा कि बेनामी सम्पत्तियों और नकदी के रूप में देश-विदेश में बहुत सारा कालाधन मौजूद है जिसके निर्माण में करवंचना के अतिरिक्त निम्नवर्ग और मध्यमवर्ग के सम्पर्कित लोगों के तरह तरह से किये गए जनशोषण की भी बड़ी भूमिका रहती है। दरअसल कतिपय बड़े राजनेताओं, बड़े अधिकारियों और बड़े कारोबारियों की मिलीभगत से चलने वाला यह एक ऐसा घातक नेटवर्क है जिससे आमलोग और सम्बन्धित राष्ट्र तो खोखला हो जाता है, लेकिन ऐसे लोग और उनके नेटवर्क मालामाल। स्वदेश इन जैसों के लिये चारागाह होता है और विदेश ऐशगाह!

यही वजह है कि अपेक्षाकृत मजबूत राष्ट्रवादी सरकार ने विगत ढाई दशक से भी पुरानी नई आर्थिक नीतियों की विफलता को समझने और फिर से उसे सफल बनाने, राष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को स्वस्थ व प्रतिस्पर्द्धात्मक कारोबारी माहौल प्रदान करने और व्यापक जनहित के नजरिये से सकारात्मक कार्यसंस्कृति पैदा करने के लिहाज से जिस तरह से पहले नोटबन्दी, फिर जीएसटी और अब बेनामी सम्पत्ति पर सिलसिलेवार रूप से हमला बोला है, उससे न केवल भ्रष्टाचार हतोत्साहित होगा, एक हदतक थमेगा बल्कि जनसरोकार भी सधेगा और वतन कलंकित होने से बच जाएगा।

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