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Thursday, August 16th, 2018 10:02 PM
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क्या अरुणाचल प्रदेश में कूटनीतिक भरोसे की जड़ खोद रहा है चीन?




क्या अरुणाचल प्रदेश में कूटनीतिक भरोसे की जड़ खोद रहा है चीन?SocialWorld



कमलेश पांडे. भारत के अरुणाचल प्रदेश की अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे चीनी इलाके लहुंजे काउंटी में चीन जिस तरह से सोना-चांदी जैसे बहुमूल्य खनिज पदार्थों की खोदाई कर रहा है, वह द्विपक्षीय कूटनीतिक भरोसे की जड़ खोदने जैसा है। इसलिए भारत को भी अपने प्राकृतिक हितों की रक्षा के लिए सतर्क होकर जवाबी रणनीति तैयार करनी चाहिए। क्योंकि चीन की एक सरकारी मीडिया ने जितनी गम्भीरतापूर्वक इस बात का खुलासा करते हुए दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ने का अंदेशा जताया है, उसके गहरे रणनीतिक और कूटनीतिक मायने हैं; जो कई तरह की आशंकाओं को जन्म दे रहे है। लिहाजा भारत सरकार भी इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए और चीन की हरकत को माकूल जवाब देने का अविलम्ब प्रबंध करना चाहिए।

जरा गौर कीजिए, चीनी मीडिया की यह खबर तब आई है जब पीएम नरेंद्र मोदी, रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन के साथ रूस की ग्रीष्म कालीन राजधानी सोची में एक अनौपचारिक शिखर सम्मेलन में शिरकत करने वाले थे। यही नहीं, उससे एक दिन पहले पीएम मोदी की जम्मू-कश्मीर यात्रा के मौके पर जब पाकिस्तान की ओर से ताबड़तोड़ फायरिंग की गई तो भारतीय सुरक्षा बलों ने भी इतना तगड़ा जवाब दिया कि पाकिस्तानी सेना गिड़गिड़ाने लगी। शायद यही वजह है कि उसका रहनुमा समझे जाने वाले चीन ने अपनी मीडिया के माध्यम से भारत को अरुणाचल खनन कार्ड दिखाकर नीचा दिखाने की क्षुद्र कोशिश की है, जिसकी जितनी भी निंदा की जाए वह कम है। इसलिए इन विघ्न सन्तोषीयों को रणनीतिक और कूटनीतिक जवाब देना ही भारत के दूरगामी हित में होगा।

इस बात में कोई दो राय नहीं कि चीन की टेढ़ी निगाहें अरुणाचल प्रदेश समेत अन्य सीमावर्ती इलाकों पर है, क्योंकि भारत और चीन के बीच कोई निर्धारित सीमा रेखा नहीं है मैकमोहन लाइन के अलावा जो कि कई जगहों पर अस्पष्ट है। इसी बात का बेजा फायदा चीन हमेशा से उठाता आया है और अक्सर विवाद पैदा करता रहता है। हाल के दिनों में भी चीनी सैनिकों द्वारा भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं। यही वजह है कि चीन अपने अप्रत्याशित खनन अभियान के जरिए अरुणाचल प्रदेश पर एक बार फिर से अपना दावा पुख्ता करना चाह रहा है, क्योंकि इसे वह दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा करार देता आया है। जबकि भारत इसे हमेशा खारिज करता रहा है।

सुलगता सवाल है कि चीन जिस तरह से इस इलाके की प्राकृतिक संपदा के दोहन के लिए यहां पर अपना आधारभूत ढांचा तैयार कर रहा है, कल वही यदि सैन्य उपयोग के लिए सहायक साबित होने लगे तो फिर भारत क्या कर लेगा? इसलिए भारत बिना समय गंवाए जवाबी तैयारी और कार्रवाई नहीं करेगा तो क्या रणनीतिक रूप से विलम्ब नहीं हो जाएगा! क्योंकि इससे पहले भी चीन दक्षिण चीन सागर में ऐसा ही करके अपने कुटिल इरादों में सफल हो चुका है। बता दें कि चीन ने पहले वहां आधारभूत ढांचा तैयार किया, फिर कृत्रिम द्वीप बनाया और इसके बाद वहां सेना तैनात कर दक्षिण चीन सागर पर अपना दावा ठोक दिया। क्योंकि उसके नीचे भी तेल और गैस के भंडार हैं।

यहां हमें नहीं भूलना चाहिए कि चीन जिस इलाके में खनन कार्य कर रहा है, वह दुनिया के सबसे दुर्गम और ऊंचे इलाकों में से एक है। वहां की प्राकृतिक चुनौतियां बेहद जटिल हैं जहां पहुंचना जितना मुश्किल है कहीं उससे ज्यादा मुश्किल वहां टिके रहना है। इसलिए अब इस इलाके का आर्थिक और सामरिक महत्व बढ़ चुका है। इस बाबत खुलासा करके चीन ने अपनी मंशा भी जाहिर कर दी है और भारतीय प्रतिक्रिया भी उसके लिए अहम मायने रखती है ताकि वह आगे की रणनीति तय कर सके। इसलिए भी चीन को आशंका है कि सीमा से सटे इस इलाके में चीन की परियोजना का भारत यदि विरोध करता है तो डोकलाम के बाद एक बार फिर दोनों देशों में तनाव हो सकता है।

जाहिर है कि भारत और चीन के बीच दोस्ती और कुश्ती के किस्से मशहूर हैं। इसलिए ताजा उठे विवादों के बाद सम्भव है कि इसी वर्ष अप्रैल में आयोजित वुहान अनौपचारिक शिखर सम्मेलन के माध्यम से मोदी-चिनफिंग ने भारत और चीन के बीच नए सिरे से जिस दोस्ती का आगाज किया है, वह अब खटाई में पड़ जाए। क्योंकि विघ्न सन्तोषी चीनी सरकारी मीडिया साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट ने अरुणाचल प्रदेश की सीमा से सटे चीनी नियंत्रण वाले भूभाग लहुंजे काउंटी में बहुमूल्य खनिज पदार्थों के उत्खनन की जो सनसनीखेज जानकारी देश-दुनिया से साझा की है, उसने दोनों देशों के बीच सम्भावित कुश्ती के एक और बहाने दे दिए हैं।

दरअसल, भारत के अरुणाचल प्रदेश की अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे चीन के नियंत्रण वाले भूभाग लहुंजे काउंटी में सोने, चांदी और अन्य कीमती धातुओं के जो विशाल भंडार मिले हैं, उनकी अनुमानित कीमत तकरीबन 60 अरब डॉलर यानी कि लगभग चार लाख करोड़ रुपए हो सकती है। स्वाभाविक है कि इतनी बड़ी रकम में से भारत के भूभाग का भी एक बड़ा हिस्सा निकलेगा ही, जिसे चीन हड़पना चाहेगा क्षेत्रीय दबदबा दिखा कर।

लिहाजा, फिर वही सवाल कि पिछले महीने के वुहान शिखर सम्मेलन के बाद जब सामरिक और अति महत्वपूर्ण मुद्दों पर दोनों देशों के नेतृत्व के बीच की समझ बेहतर हुई है तो फिर इसकी नौबत क्यों आई? क्योंकि तब दोनों नेताओं के बीच डोकलाम जैसे गतिरोध टालने को लेकर गम्भीर चर्चा हुई बताई गई थी। कहीं ऐसा तो नहीं कि यह खनन कार्य दक्षिण तिब्बत पर फिर से दावा जताने की बीजिंग की महत्वाकांक्षी योजना का हिस्सा है। क्या इसी नजरिए से उसके भूवैज्ञानिक और सामरिक मामलों के विशेषज्ञों ने भी हाल में ही इस इलाके का दौरा करके सबको चौंका दिया है?

यदि ऐसा है तो यह चीन की भारी भूल है। भारत इसे कतई बर्दाश्त नहीं करेगा। उसे यह याद रखना चाहिए कि कतिपय ऐसे ही वजहों से भारत और चीन के रिश्ते कभी सहज नहीं रहे। और जब भी भारत ने अतीत के कड़वे अनुभवों को भुलाकर आपसी रिश्ते को सामान्य बनाने की पहल की तो चीन ने पीठ में छुरे घोंपकर अपनी नादानी दिखाने में कोई कोर कसर भी नहीं छोड़ी! अब यह उसकी बचकाना हरकत है या फिर कोई सोची-समझी रणनीति, तय करना मुश्किल नहीं है। इसलिए लगता है कि भारत और चीन के बीच चूहे-बिल्ली का खेल कभी बन्द होने वाला नहीं है, क्योंकि भरोसेमंद द्विपक्षीय सम्बन्धों के प्रति वह कभी भी ईमानदार नहीं रहा।

यह कितना अजीबोगरीब है कि वुहान अनौपचारिक शिखर वार्ता से विकसित हुई समझदारी को एक माह बाद ही धत्ता बताते हुए उसने डोकलाम के अलावा लहुंजे काउंटी में भी एक और मोर्चा खोला दिया है। याद दिला दें कि अक्साई चीन से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक उसने ऐसे कई ठिकाने ढूंढ लिए हैं जहां वह भारत को उंगली करके कुछ नीचा दिखा सके। यही वजह है कि द्विपक्षीय कूटनीति के दो-चार खुशगवार लम्हों को छोड़कर दोनों देशों के आपसी रिश्ते बेहद तल्ख रहे।

चीन को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय जनजीवन में हिमालय का खास महत्व है। यहां की जीवन दायिनी नदियां, जीवन औषधि प्रदान करने वाले घने वनों से उसकी आध्यात्मिक आस्था भी जुड़ी हुई है। यह भारतीयों के लिए उत्तर में सदियों से पहरेदारी भी करता आया है। हमारे कई तीर्थस्थल और रमणीक स्थल हिमालय के शिखर या फिर उसकी गोद में बसे हैं। इसलिए हिमालयी क्षेत्र में नए पाए गए अयस्क मतलब कि खनिज पदार्थों पर दावेदारी का पूरा हक भारत को भी अपनी सीमा में है जिसका अकेले दोहन करने की इजाजत उसे कभी भी नहीं दी जा सकती है। शायद इसलिए भी चीन आशंकित है कि कहीं इस मसले को लेकर भारत और चीन के बीच शक्ति सन्तुलन न बिगड़ जाए, क्योंकि ऐसा होना दोनों के लिए अहितकर होगा।

बहरहाल, अरुणाचल प्रदेश में वास्तविक सीमा रेखा को लेकर चीन और भारत के अलग-अलग दावे हैं। इसलिए दोनों देशों के बीच 5 बॉर्डर पर्सनेल मीटिंग पॉइंट्स भी निर्धारित हैं जहां वे आपसी विवाद निपटाते हैं। ये निम्नलिखित हैं- अरुणाचल प्रदेश में बम ला और किबिथू, लद्दाख में दौलत बेग ओल्डी और चुशुल और सिक्किम में नाथू ला। बता दें कि भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा के 3 हजार 488 किलोमीटर पर सीमा विवाद है।

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