page level


Wednesday, June 20th, 2018 09:41 AM
Flash

कर्नाटक के नाटक का अंत, लहुलुहान हुआ जनतंत्र और गणतंत्र




कर्नाटक के नाटक का अंत, लहुलुहान हुआ जनतंत्र और गणतंत्र



पिछले कुछ दिनों से कर्नाटक में जो नाटक चुनाव पूर्व और चुनाव पश्चात हो रहा था उसका अंत हो गया। फिलहाल जो लहर उठी थी वह शांत हुई। देश ने, जनता ने राहत की सांस ली। हमारे तमाम सियासतदारों ने जो कुछ भी सियासती दांव-पेंच खेले, वे लोकतंत्र और हमारे गणतंत्र दोनों को लहुलुहान कर देश को शर्मशार कर रहे थे। सियासत की पार्टियां कोई भी हो सभी ने शर्मसार किया। हालांकि यह कोई पहली बार नहीं हो रहा था किंतु वर्तमान दौर में दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है और हमारी लोकतांत्रिक व गणतांत्रिक संप्रुभता को निचले स्तर की ओर ले जा रहा है।

कहने को आम जनता लोकतंत्र में मालिक की हैसियत रखती है किंतु सियासतदारों ने (फिर वह सब किसी भी पार्टी के हो) गणतंत्र का दुरूपयोग कर जनता के साथ धोखा ही किया है। लोक-लुभावने वादों से लेकर, जनादेश के विपरीत खेल कर अपने हिसाब से राजनैतिक दांवपेंच के सहारे अपने सुविधानुसार सत्ता प्राप्ति का रास्ता बना लेना।

सभी मिलकर जिस देश के लिए, देश की जनता के विकास के लिए चुनकर आते हैं, उन्हीं के विपरीत कार्य कर स्वंय के विकास की गाथा लिखने में व्यस्त हो जाते हैं। ये सभी दिन-दोगुनी-रात-चौगुने लार्भाजन में लग जाते हैं। तमाम प्रकार के सरकारी लाभ पाना, सुविधाओं को पाना, सरकारी ताकत को पाना ही इनका उद्देश्य हो रहा है। इन तमाम ताक़तों-अधिकारों का उपयोग स्वयं के लिए, स्वयं के ख़ास लोगों के फ़ायदों के लिए करते हैं।

यहां चुनावी वादों को लेकर, भाषणों में बोलने वाले शब्द सिर्फ जनता को मूर्ख बनाने वाले जुमले होते है। यही सब हमें इस कर्नाटक के चुनावों में भी देखने को मिला, इसके पूर्व के चुनावों में भी देखने को मिलता रहा है। चुनाव पूर्व में भी भाषणों में वे सभी एक-दूसरे को नीचा दिखाने में, कौन क्या बोल सकता है, क्या नहीं बोल सकता है के सिवाय कुछ नहीं था। न देश के उत्थान की, न राज्य के उत्थान की बात थी, न ही सभी पार्टियों द्वारा अपने-अपने समय में क्या विकास कार्य किए गए का उल्लेख रहा। रेवड़ियां बांटने के वक़्त सभी मिलजुलकर खा जाते हैं। इन बातें का सबूत स्वयं को मिलने वाली तमाम सुविधाओं पर जो बिल लाते हैं वह बगैर बहस के पास कर बांट लेते हैं और देश के सामने एक-दूजे से इस प्रकार लड़ने का नाटक करते हैं। जैसे देश के सबसे अधिक चिंतक ये ही हैं। जबकि देशवासी उनको किसी चोर-उच्चके से ज़्यादा दिखाई नहीं पड़ते।

कालाधन विदेश से लाना था किंतु वहां तो बस दिखावा किया गया क्योंकि अधिकांश पैसा उन सभी नेताओं या नेताओं के चहेते मल्टीमिलिनियरों का है जो वो कभी देश में नहीं ला सकते। उसके विपरीत उन्होंने संपूर्ण देश में नोटबंदी कर आम जनता को चोरों के कटघरे में ला खड़ा कर दिया। जिस लाल फीताशाही को खत्म करने की बात हो रही थी पूरी देश की जनता को उन अफसरों के हवाले कर दिया।

यही ये नेतागण नहीं रूके। देश के चंद घरानों को फ़ायदा पहुंचाने के लिए पूरे देश के व्यापार तंत्र को ही तहस-नहस कर दिया। आज संपूर्ण देश में व्यापार की स्थिति ख़राब है किंतु कोई सुनने वाला नहीं है। ना पक्ष आम जनता के साथ है न ही विपक्ष। सभी सत्ता की अपनी भूख मिटाने का प्रयास कर रहे हैं और जो नाटक खेल रहे हैं वह बेहद ही शर्मनाक और देशद्रोह की श्रेणी में आता है।

इस लोकतंत्र में जनता द्वारा जो भी जनादेश दिया गया, ये नेता, सियासतदार उसे अपने ढंग से तोड़-फोड़ कर अपनी सत्ता भूख मिटाने का कार्य बखूबी कर रहे हैं। जबकि कायदा यह कहता है कि जनता जिस भी प्रकार का जनादेश दे उसी अनुरूप अगले पांच वर्ष तक देश विकास की बात होना चाहिए।
और जहां तक गणतंत्र की बात है उसे भी वे इस तोड़-फोड़ व कानूनी दांव-पेंच का सहारा ले कर नाहक ही परेशान करते रहते हैं और देश के कानून व उनके रखवालों को अनावश्यक कार्य को उलझाकर रख देते हैं। जिस वजह से उन्हे ंजो कार्य सही मायने में करना चाहिए वह कर नहीं पाते।

अंत में हम बात वर्तमान सकरार की करें उसके पूर्व हम पहले की तमाम सरकारों की बात कर लें। उन्होंने भी अनेक गलत काम करे, अनेकों-अनेक गलतियां की हैं तभी वे सभी ‘पूर्व’ की सरकार बन कर रह गई। किंतु सबसे अधिक दोष में वर्तमान सरकार का बताना चाहता हूं क्योंकि अभी तमाम सत्ता तंत्र उन्हीं के हाथों में है। उनके पास मौका है सही कार्य करने का। यदि उन्होंने भी जो कि हो भी रहा है गलतियां की पूर्व की सरकारों की तरह या उससे अधिक वह भी ‘पूर्व’ की सरकार होकर रह जाएगी। वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी जी इन सब का दारोमदार बहुत अधिक है। किंतु उन्होंने जिस प्रकार गत चार वर्षों का कार्य किया वह कोई उल्लेखनीय नहीं है। उन्होंने भी वह सभी गलतियां या यूं कहे कि उन सभी से कहीं ज़्यादा गलतियां की है तो वह कोई बड़ी बात नहीं।

चार वर्षों में उनके खातों में जो बीजेपी की सफलता का परचम पूरे देश में लहलहा रहा है। वह उनकी नहीं विपक्ष की कमजोरियों की वजह से है। विपक्ष इतना मायनस में चला गया कि उनका मायनस भी प्लस ही दिख रहा है। कुल मिलाकर इस सत्ता की भूख ने सभी नेताओं को गिरा दिया है वे ये भूल गए हैं कि वे इस देश के मालिक नहीं बल्कि मालिक ‘आम जनता’ के प्रतिनिधि भर है। जिस दिन यह मालिक जाग गया सभी को लेने के देने पड़ जाएंगे। या तो ये स्वयं सुधर जाए अन्यथा वक़्त सुधार देगा। जनता के जागने भर की देर है। ‘जय हिंद’

यह भी पढ़ें :

येद्दयुरप्पा अकेले नहीं, चंद घंटों के मुख्यमंत्री बने थे ये 5 नेता

मध्य प्रदेश में BJP को लगा बड़ा झटका, 500 कार्यकर्ता हुए कांग्रेस में शामिल

भारत सरकार दे रही है आपको Digital India में Internship करने का मौका

Sponsored






Related Article

No Related Article