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Wednesday, May 23rd, 2018 11:21 PM
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आओ आरक्षण-आरक्षण खेलें-अखंड भारत के सियासतदार




आओ आरक्षण-आरक्षण खेलें-अखंड भारत के सियासतदारPolitics



‘आरक्षण’ एक लंबे समय से सियासत का एक महत्वपूर्ण खेल। कोई भी सरकार में हो, कोई भी विपक्ष में हो ये सबका चाहेता खेल है जो राजनैतिक शतरंज की बिसात पर खेला जा रहा है। पहले राजा-रजवाड़े शतरंज का खेल खेलते थे किंतु वह सीधा-साधा खेल होता था। उसका एजेंडा भी सीधा और स्पष्ट होता था। आज ‘लोकतंत्र’ के राज में जहां कहने को जनता मालिक होती है किंतु खेल उनके हाथ में न रहकर उनके द्वारा ही चुने प्यादों के हाथ में रहता है। चालें जनता नहीं उनके प्यादें चलते हैं और शह और मात जनता की ही होती है। ये खेल अंततः दिलचस्प भी है और खतनरनाक भी है। इसकी अनगिनत चालों में से आरक्षण भी एक चाल है। ‘रोटी-कपड़ा-मकान’ से लेकर ‘गरीबी हटाओ’, ‘हिंदू-मुस्लिम’, ‘भारत-पाकिस्तान’, ‘राम मंदिर’, ‘गाय माता’, ‘विकास’, ‘अच्छे दिन’, ‘शाइनिंग इंडिया’, ‘कालाधन’, ‘नोटबंदी’ ऐसी अनेक चालों के नाम है जो समय-समय पर चली जाती है। इन सभी चालों में दांव पर होते हैं ‘आम आदमी’। इस देश की मालिक ‘जनता’ जो है तो ‘आज की राजा’ किंतु किसी प्यादे से कम नहीं है।

आज हम बात कर रहे हैं ‘आरक्षण’ रूपी चाल की। सबसे खतरनाक अखंड भारत को खंड-खंड में बदलने वाली चाल की। एक भाई को दूसरे भाई से लड़ाकर बांटने वाली चाल की। इस चाल का लक्ष्य स्पष्ट था, बरसों-बरस से दबे तबके को ऊपर उठाने का। काम के अनुरूप किए गए भेद ने जो सामाजिक विकृती पैदा कर उसे पुनः ठीक कर नए परिवेश में ढालने का मकसद था और है भी। किंतु हमारे सो कॉल्ड सियासत खेलने वाले को सीधे-सीधे खेल में कहां मजा आता है। उन्हें तो जब तक कहानी में ट्विस्ट न हो, मसाला न हो, कुछ उठा-पठक ना हो मजा ही नहीं आता। बस उसके पक्ष के लोगों ने भी उसे अव्यवहारिक बना कर पेश किया जहां मकसद उनका उत्थान था ना कि महज रेवड़ियां बांट कर उनके इमोशन से खेल कर उनकी तकलीफ़ों का लाभ उठा कर अपना उल्लू सीधा करना था। किंतु ऐसा किया गया। एक भाई को दूसरे भाई के खिलाफ भड़का कर खड़ा किया गया। नतीजा चंद लोगों को इसने लंबे अंतराल में लाभ मिल पाया, एक बड़ा तबका आज भी इससे अछूता रहा दूसरे संपन्न भाईयों के खिलाफ भड़का कर संबंधों में जहर घोल दिया गया। ये उसी प्रकार की स्थिति है कि एक इंडस्ट्री को चलाने में पैसे लगाने की भी जरूरत होती है तो श्रमिक की भी। अब यदि उन्हें एक-दूजे के खिलाफ खड़ा कर दिया जाए तो क्या इंडस्ट्री चल पाएगी। क्या वो प्रॉफिट कमा पाएगी, क्या उससे उन दोनों को लाभ मिल पाएगा। उत्तर बहुत स्पष्ट है ‘नहीं’।

पहले एक वर्ग की गलती का खामियाजा इसका भुगत ही रहा था। अब दूसरे की गलती का खामियाजा भी सभी भुगत रहे हैं। न पूरा समाज का उत्थान हो पा रहा है और ना ही दोनों भाईयों में एक-दूसरे के प्रति सम्मान जाग रहा है। मकसद यह होना था कि बराबरी का मौका सभी को मिलना चाहिए। ये अंतर जो सुविधाओं में है उसे पाटा जाना चाहिए। ताकि वे बराबरी से खड़े होकर एक स्वस्थ परंपरा में अच्छे समाज का निर्माण कर सके। ऐसी स्थिति सभी के लिए सम्मानजनक होगी किंतु होता यह है अभी एक को दूसरे के खिलाफ भड़काकार, रिश्वत भर देकर उनसे महज वोट ले लिए जाते हैं। उनको बार-बार आरक्षण रूपी सुविधाओं का बोलकर निचला तबका कह कर बार-बार नीचा दिखाया जाता है और यही एहसास दिलाया जाता है कि वे नीचे के हैं। वहीं उच्च तबके के अपने आप को नेता कहने वाले समाज में उन्हें निचले तबके के खिलाफ खड़ा करते हैं। जबकि उनका रोल उस तबके को भी गले लगाकर, हाथ पकड़कर सम्मान पूर्वक साथ लेने का होना चाहिए ना कि उनको उस तबक के भाइयों के खिलाफ खड़ा करने का होना चाहिए।

अंततः यदि वे दोनों भाई लड़ेंगे तो कहीं के भी नहीं रहेंगे। इस देश के मालिक आम जनता को इन सियासतदारों का मकसद समझ में आ जाना चाहिए और स्वयं खड़े हो दोनों भाईयों को एक स्वस्थ खुले मान की परंपरा को अपनाकर स्वस्थ समाज का निर्माण करना चाहिए। अखंड भारत को खंड-खंड में ना बांटकर अखंड ही रहने देना चाहिए।

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